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सोमवार, 4 अप्रैल 2011

(हास्य कविता)ऐसी की तैसी


पहलवान
से मुलाक़ात हुयी
उसका
नया कारनामा  पूंछा
वो बोला
मैंने उसकी
ऐसी की तैसी कर दी
मुझे समझ नहीं आया
सवाल उससे किया
क्या कैसी थी
जिसकी
ऐसी की तैसी कर दी
जवाब मिला
जैसी थी,वैसी थी
मैंने तो
करनी थी,सो कर दी
मुझे बिलकुल समझ
नहीं आया
जब वैसी ही थी,जैसी थी 
तो फिर
ऐसी की तैसी क्यूं कर दी
पहलवान गुस्से में बोला
तुम्हें क्या मतलब बहुत
बोल रहे हो 
अब तुम्हारी भी
ऐसी की तैसी कर दूंगा
मैं घबरा गया,जवाब दिया
जिसकी तैसी करनी थी
उसकी वैसी कर दी ,
मेरी वैसे ही रहने दो
जैसी थी
04-04--11
593—26 -04-11

1 टिप्पणी:

  1. .

    लोग अक्सर ऐसी की तैसी ही करना चाहते हैं। यही उनका उद्देश्य होता है । कौन कैसा है , इससे उनको कोई सरोकार नहीं होता । ऐसे लोगों से दूरी बनाये रखते हुए "जैसे हैं वैसे ही भले " में भलाई है ।

    उत्कृष्ट रचना के लिए बधाई।

    .

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