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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

काव्यात्मक लघु कथा -प्रतिशोध


 जन्म के
समय,माँ को खोया
माँ बाप का प्यार
कभी नसीब ना हुआ
सदा प्रताड़ित होता रहा
चुप चाप सहता रहा
प्रतिशोध
मन में पालता रहा
मेहनत,और जज्बे से
आगे बढ़ता रहा
जिस कम्पनी में 
सौतेला भाई
काम करता था
उस में सर्वोच्च 
अफसर बन गया
प्रतिशोध जागा
सौतेले भाई को
नौकरी से
निकालना
तय कर लिया
हस्ताक्षर 
करने ही वाला था
एक परिचित ने कमरे में
प्रवेश किया
अपने पुत्र की
नौकरी के लिए
निवेदन किया
उसे पता था, 
परिचित का पुत्र
निरंतर उन से 
दुर्व्यवहार करता था
कभी गाली देता
कभी हाथ उठाता
परिचित की बात सुन
वो हतप्रभ रह गया
 परिचित से पूंछा
राक्षस पुत्र के लिए
नौकरी
क्यों मांग रहे हो ?
जवाब मिला,
वो कुछ भी करे
अगर मैं उसकी 
बराबरी करूंगा
तो उस में और मेरे में
क्या फर्क रह जाएगा
परमात्मा पर विश्वाश है
वक़्त के साथ
वह भी बदल जाएगा
यह सुन, 
उसने भी विचार किया
प्रतिशोध छोड़ दिया
सौतेले भाई को
नौकरी से निकालने का
निश्चय त्याग दिया  
11-04-2011
651-84-04-11

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