ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

आज भी अन्धेरा था



 आज भी अन्धेरा था
=======
चाँद पूरा था
रात सर्द थी
मेरे लिए गर्म थी
वो मेरे पास थी 
दिल में ख़ुशी 
जहन में सुकून था
कब भोर हुयी
पता ना चला
उसके जाने का
वक़्त हुआ
दिल घबराने लगा
कब लौट कर आएगी 
मन पूछने लगा
जुदाई के लम्हों 
से डर लगता है 
लौट कर आने तक
कैसे वक़्त कटेगा
सवाल तंग करता है 
सोचते सोचते
नींद खुल गयी
ना वो थी 
ना चांदनी रात थी
सुबह का समय था
सूरज उग रहा था
मेरे लिए आज भी
अन्धेरा था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
21-04-2011
722-144-04-11
E

2 टिप्‍पणियां:

  1. डा. श्याम गुप्त23 अप्रैल 2011 को 3:47 pm

    डा. श्याम गुप्त said...

    अच्छा स्टेटमेन्ट है...

    April 23, 2011 9:22 AM

    उत्तर देंहटाएं
  2. DR. ANWER JAMAL said...

    वाह !

    April 23, 2011 9:25 AM

    उत्तर देंहटाएं