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गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

सपना देखने से पहले ही टूट गया


शाम का समय था
तेज़ बरसात में
छाता पकडे खडा था
बरसात रुकने का
इंतज़ार कर रहा था
तभी सामने नज़र पडी
वो सड़क के दूसरी तरफ
पेड़ के नीचे खड़ी थी
बरसात में भीग रही थी
निरंतर परेशानी से
इधर उधर देख रही थी
पहली नज़र में मुझे
भा गयी 
मन चाहने लगा
छाते में साथ जाए
बरसात से बच जाए
दिल को
सुकून मिल जाए
अचानक
उसने मेरी तरफ देखा
मैंने मुस्काराकर हाथ
हिलाया
उसने भी मुस्करा कर
इशारे से मुझे बुलाया
दौड़ कर 
 उस तरफ पहुंचा
कुछ कहता उस से पहले ही
एक गाडी आकर रुकी
उसने दरवाज़ा खोला
बिना कुछ कहे अन्दर
बैठ गयी
देखते ही देखते, गाडी
चली गयी
मैं खडा का खडा
रह गया
मन उदास हो गया
सपना  
देखने से पहले ही
टूट गया 
14-04-2011
670-103-04-11

2 टिप्‍पणियां:

  1. कोई नहीं बुलाने का सौभाग्य तो पाप्त हुआ, अभी तक तो हमें ये मौका भी नहीं मिला

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