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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

मैं भी इंतज़ार में था,वो भी इंतज़ार में थे

सुबह से शाम
इंतज़ार करता रहा
खिड़की से
सड़क को देखता रहा
आँखों से 
अश्क बहाता रहा
उनका आना ना हुआ
शाम हो गयी
आँखें लाल हुयी
उम्मीद
फिर भी कम ना हुयी
अब तक  
उनका दीदार ना हुआ
रात भी आ गयी,
रोना कम ना हुआ
ना वो आये
 ना पैगाम आया
हिम्मत टूट गयी,
आँख भी लग गयी
सुबह उठा दरवाज़ा खोला
वो बाहर लेटे थे,
हाथ पैर ठन्डे थे
गौर से देखा तो 
दम तोड़ चुके थे
दर तक पहुँच कर भी
नहीं पहुंचे थे
मैं भी इंतज़ार में था,
वो भी इंतज़ार में थे
कॉपीराइट@

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-04-2011
609-42 -04-11

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