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शनिवार, 2 अप्रैल 2011

साथी सफ़र के बदल गए ,मंजिल मगर बदली नहीं



साथी सफ़र के बदल गए
मंजिल मगर बदली नहीं
अरमान
मोहब्बत से जीने के बनाए
पूरे ना हुए
रास्ता मगर बदला नहीं
किश्ती
को किनारा ना मिला
मांझी मगर बदला नहीं
निरंतर
इबादत खुदा से करी,
हसरतें पूरी ना हुयी
खुदा मगर बदला नहीं 
  मोहब्बत मेरी फितरत थी
जवाब में नफरत मिली
फितरत मगर बदली नहीं
02-04--11
579—12 -04-11

1 टिप्पणी:

  1. इबादत खुदा से करी,
    हसरतें पूरी ना हुयी
    खुदा मगर बदला नहीं
    wah badal jaye ya main badal jaun ... ye fitrat nahi

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