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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

हादसे अब हैरान नहीं करते,लूट, क़त्ल, डाके अब नए नहीं लगते



हादसे 
अब हैरान नहीं करते
लूट, क़त्ल, डाके अब
नए नहीं लगते
घोटाले अब पुराने हो गए
निरंतर रोना,दुखी होना
अब आदत बन गए
अखबार भी सब
पुराने लगते
किरदार बदल कर
खबरें पुरानी छापते
टी वी में कहानी वही
दोहराई जाती
बिना भूकंप धरती
हर दिन कांपती
मौत अब दरवाज़े पर
खड़ी दिखती
किस को ग्रास अपना
बनाएगी
अब किस की बारी
होगी
हर जान इंतज़ार
करती
डरते डरते  जीवन
गुजारती 
दिन गुजरने पर खैर
मनाती
सुबह फिर नींद
डरते डरते खुलती
28-01-2011

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