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शनिवार, 25 दिसंबर 2010

व्यथा उनकी कम कर दे,उन्हें जीना सिखा दे


ना
मुकाबला किसी से
ना झगडा किसी से
जो सीखा दोहराता हूँ
कर्म अपना करता हूँ
संसार में आया हूँ
जीवन अपना जीता हूँ
क्यों लोग प्रतिशोध 
रखते
हर वक़्त होड़ करते
निरंतर विचलित रहते
कैसे नीचा दिखाएँ?
कैसे मुझे हराएँ?
आगे निकल जाएँ
वक़्त अपना जाया
करते
चैन अपना खोते
व्यथा खुद की बढाते
मैं एकाग्र चित्त चलता
रहता
निरंतर बढ़ता जाता
दुआ खुदा से करता
रास्ता उन्हें दिखा दे
उस पर चलना बता दे
कर्म करना सिखा दे
औरों की खुशी में
खुश रहना सिखा दे
व्यथा उनकी कम
कर दे
उन्हें जीना सिखा
 दे
25-12-2010

क्यूँ याद उन की आती,बार बार दिल दुखाती


क्यूँ
याद उन की आती
बार बार दिल दुखाती
ज़ख्मों को कुरेदती
अहसास अकेलेपन
का देती
कुछ तो ऐसा होगा
उनमें
जाने के बाद भी निरंतर
बुलाती
ग़मों को और बढाती
ना रोने देती,ना सोने
देती
हर याद उम्मीद
नयी बंधाती
शायद गलती खुदा से
हुई
जिसे रहना था वो
चली गईं
उन्हें फिर लौटाएगा
मुझ से फिर
मिलवाएगा
25-12-2010

साजिन्दे महफ़िल-ऐ-ज़िन्दगी में बहुत थे,कल तक महफ़िल में साथ थे,


साजिन्दे
महफ़िल-ऐ-ज़िन्दगी
में बहुत थे
कल तक महफ़िल में
साथ थे
हर नगमा साथ
सुनाते थे 
हर साज़ संग
बजाते थे
एक सुर और लय में
गाते थे
साजिन्दे कम होते गए
गम मेरे बढ़ते गए
नगमे कम होते गए
आवाज़ रुन्धने लगी
आँखें नम रहने लगी
लय टूटने लगी
ज़िन्दगी अब बोझ लगती  
निरंतर सोचता हूँ 
महफ़िल कब उठेगी 
 शमा कब बुझेगी 
शायद मुलाक़ात ज़न्नत 
में होगी
महफ़िल फिर वहीँ
सजेगी
ज़िन्दगी तब तक
यूँ ही कटेगी
25-12-2010

कहानी मेरे मिटने की सुनाएगी,अंजाम-ऐ-मोहब्बत नज़र कराएगी

कोई चैन
मेरा चुरा गया
नींद मेरी उड़ा गया
अरमान दिल में
जगा गया
चुपके से चला गया
वादे से मुकर गया
जली आग भुजा गया
मुझे धुएं में उड़ा गया
शायद उसे पता नहीं
राख भी याद उसकी
दिलायेगी
कभी जली थी,जहाँ को
बतायेगी
निरंतर कहानी मेरे
मिटने की सुनाएगी
अंजाम-ऐ-मोहब्बत 
नज़र कराएगी
हर दिल वाले को
रूलाएगी
25-12-2010

भूख नेताओं की बढ़त जात,सुख जनता के घटत जात



जनता निरंतर
रोत जात
महंगाई सुसरी
बढ़त जात
बच्चे रोत जात
चूल्हे बुझत जात
भाव सब्जी,तेल के
बढ़त जात
जान की कीमत
घटत जात
भूख नेताओं की
बढ़त जात
सुख जनता के
घटत जात
बेईमान हँसत जात
इमानदार रोत जात
अमीर,अमीर होत जात
गरीब गरीब रह
जात
24-12-2010

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

विधी का विधान बड़ा निराला,पत्नी श्याम वर्ण पती गोरा


विधी का
विधान बड़ा निराला
पत्नी श्याम वर्ण
पती गोरा
पत्नी छुई मुई
पती हाथी का बच्चा
पत्नी डाक का डब्बा
पती बिजली का 
खम्बा दिखता
पत्नी कमसिन
पती पांच बच्चों का
बाप लगता
हूर की बगल में लंगूर
चुइया की बगल में
शेर दिखता
पत्नी शेरनी 
पती खरगोश सा
पत्नी नखरे वाली
पती बेशर्मी का नमूना
पत्नी फूअड़
पती सलीका पसंद,
पत्नी बनी ठनी
पती फटेहाल रहता
निरंतर हर किस्म के
जोड़े होते
एक से एक निराले
 दिखते
24-12-2010

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

निरंतर इंतज़ार में रोते थे,अब बिछड़ने पर रो लेंगे

ना लब्जों को  
खोलो
ना लफ्जों से
खेलो
क्या चल रहा 
दिल में तुम्हारे
अंदाज तुम्हारा
बता रहा
नज़रें फिराना बात
दिल की बता रहा
वक़्त और ना
गुजरने दो
जो सज़ा देनी है
जल्द दे दो
लम्हा लम्हा ना
तडपाओ  
तिल तिल कर ना
मारो
निरंतर इंतज़ार में
रोते थे
अब बिछड़ने पर
रो लेंगे
मोहब्बत की कीमत
अदा कर देंगे 
हर सिला भुगत
लेंगे
21-12-2010

मोहब्बत करने वाले,ख़्वाबों में भी मिलते,गुफ्तगू ख्यालों में भी करते


  
क्यूं
दुनियावालों से
डरते
क्यूं दूर दूर रहते
क्यूं अब नहीं
मिलते
मोहब्बत करने वाले
ख़्वाबों में भी मिलते
 गुफ्तगू ख्यालों में भी
करते
 मिलने के बहाने
निरंतर ढूंढते
रास्ते नए खोजते
मोहब्बत में क्या नहीं
करते
जान तक अपनी
लुटाते
ज़न्नत तक साथ
निभाते
21-12-2010