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शनिवार, 11 दिसंबर 2010

कौन अपना कौन पराया,सब चेहरे एक से लगते

कौन
अपना कौन पराया
सब चेहरे एक से लगते
शक किसी पर नहीं करता
अचरज भी नहीं होता
ना शब्दों से भ्रमित हूँ
ना मुस्कान से प्रभावित
अपने में सीमित हूँ
मन ही मन मुस्कराता हूँ
निरंतर मीठे झूंठ से दूर
ना बोलता हूँ,,ना सुनता हूँ
लोग बेज़ुबां ,बहरा कहते 
खैर इसी में
मनाता हूँ
11-12-2010

निरंतर सीचाँ जिन्हें खून से, उन पौधों को फिर से हरा करूंगा

घर मेरा
उजड़ेगा नहीं
वैभव कम होगा नहीं
नए रंगों से दीवारें
सजाऊंगा
तसवीरें उन पर नयी
लगाऊंगा
नए फूलों से इसे
महकाऊंगा
नए विचारों से कर्तव्य
 निभाऊंगा
निरंतर सीचाँ जिन्हें
खून से
उन पौधों को फिर से
हरा करूंगा 
विश्वाश को टूटने
नहीं दूंगा
माहौल को खुशहाल
बनाऊंगा
11-12-2010

निरंतर खुद से पूंछता हूँ, मेला आख़िरी है सोचता हूँ


संध्या 
हो गयी
सूरज ढलने लगा
किरणों का ताप
कम हो गया 
मेला समाप्त हो रहा 
तमाशे कम हो रहे
तमाश  बीन छंट गए
कदम भी थक गए
फिर मेले कब लगेंगे
देखेंगे, या बिन देखे
रह जायेंगे
कोई  साथ आयेगा
या अकेले रह जाएँगे
तमाशे पुराने होंगे
या नए दिखेंगे 
निरंतर खुद से
पूंछता हूँ
मेला आख़िरी है
सोचता हूँ
11-12-2010

अगर पंछी के पंख ना होते,कैसे गगन को वो पाता

अगर 
पंछी के पंख
 ना होते
कैसे गगन को
वो  पाता
उड़ान से नभ को
कैसे नापता
सार्थकता अपनी दर्शाता
कैसे औरों को लुभाता
मन में इच्छा उड़ने की
जगाता
बिना पंछी के गगन
कौन देखता
सूना गगन कैसा
लगता
बिना गहनों के रीता
दिखता
 ना भाता,ना इच्छा
जगाता
आभास शमशान का
नभ से होता
मिलन पंच्छी और
गगन का
निरंतर नज़ारा भाईचारे
का देता
कैसे एक दूसरे के
लिए जिएँ
सन्देश जग को 
देता
11-12-2010






निरंतर दोष किस्मत को देता,सदा व्यथित और विचलित रहता



क्यूं
सिर्फ ग्रीष्म में गर्मी
शरद में शीत
सावन में बारिश
वसंत में बहार होती
क्यूं साल भर बसंत
और सावन नहीं होता
इंसान के मन का मौसम भी
निरंतर बदलता
परमात्मा के नियम
सब के लिए बराबर
उसके लिए सर्दी,गर्मी सब
बराबर
जरूरत इंसान को है
शरद में गर्म,ग्रीष्म में सर्द
 रहने की
अपने को वक़्त के साथ
बदलने की
जो वक़्त  के साथ नहीं
बदलता
 निरंतर दोष किस्मत को देता
सदा व्यथित और विचलित
 रहता
ना खुश रहता
ना खुशी देता
11-12-2010

कभी कभी अकेला बैठा,पीछे लौट जाता हूँ

कभी
कभी अकेला बैठा
पीछे लौट जाता हूँ
जिस पथ पर चला हूँ,अब तक
उस पर फिर से चलता हूँ
जहां गिरा था,
खाई थी चोट कभी
चौकन्ना हो उठता हूँ
जहां मिला था प्यार अथाह,
वहाँ ठहर जाता हूँ
चुभा था,काँटा जहां
नज़रें फिराता हूँ
आगे बढ़ता जाता हूँ
निरंतर सफ़र में कभी रोता,
कभी हंसता हूँ,
कभी खुद पर, कभी किसी पर
क्रोधित हो उठता हूँ
कभी  निर्मल,
कभी निर्मम हो जाता हूँ
सवाल खुद से करता हूँ
क्यूं ना केवल हँसू  सफ़र में 
क्रोध घ्रणा को त्यागूँ
कभी कभी अकेला बैठा
पीछे लौट जाता हूँ
11-12-2010