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शनिवार, 4 दिसंबर 2010

लोग सिर्फ जीतने के लिए खेलते हैं

अफ़सोस लोग सिर्फ
जीतने के लिए खेलते हैं
ज़िन्दगी भर
इसी मकसद से जीते हैं
हार जीत खेल का हिस्सा हैं
एक जीतता एक हारता है
बेईमानी से जीते हुए खेल से
इमानदारी से हारा हुआ
खेल अच्छा होता है
हार में भी जीत का
नशा होता है
लोग निरंतर
साम,दाम,दंड,भेद
का इस्तेमाल करते हैं
जीत के लिए ईमान का
सौदा करते हैं
भूल जाते हैं
एक दिन तो खुदा को
जवाब देना होगा
जिस फितरत से जीते हैं
उसीसे खुद का नाश करते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

04-12-2010

असल में दिल आप को दे दिया,इसलिए आप,मुझे अच्छे लगते हो


तरसती
आँखों के मंजर हो
गर्मी मिटाए वो ठंडक हो
ख़्वाबों को पूरा करे वो
हकीकत हो
ख्यालों को रोक दे
वो नज़ारा हो
सुकून दिल को पहुंचाए
वो राहत हो
निरंतर लब्जों से नवाज़ा जिसे
वो ग़ज़ल हो
खुदा की कारीगरी का
नमूना हो
उसका बनाया करिश्मा हो
मेरा चैन मिटाया वो
बेचैनी हो
मुझे लूट लिया वो
लुटेरा हो
जो भी हो मेरे अरमान हो
मेरे ख्यालों का मसला हो
तारीफ में जुमले,कितने
भी कहूं
असल में दिल आप को
दे दिया
इसलिए आप,मुझे अच्छे
लगते हो
04-12-2010

गर आँखों में अश्क ना होते,लोग कैसे रोते

गर
आँखों में अश्क
ना होते
लोग कैसे रोते

गम ज़ाहिर कैसे करते

बिन बोले
,सुख,दुःख
कैसे दर्शाते
गर ख्वाब ना होते

ना लोग इच्छा रखते

ना नए सपने बुनते
ना सपने टूटते,ना दुखी होते
 ना लोग अश्क बहाते
गर ख्याल ना होते

लोग ना उलझते

ना बेचैन होते
ना
बेचैनी देते
करिश्मा खुदा का
जिसने सुख,दुःख दिया
मिलना,बिछड़ना दिया
 हंसने के साथ रोना दिया
खामोश ज़िन्दगी में
पेच डाल दिया
अनेक रंगों से उसे
 भर दिया
निरंतर इंसान इनमें
उलझता
किसी तरह जीवन
अपना काटता
04-12-2010

इंसान झूंठ से सज़ा है,ईमान,धर्म का,सिर्फ नाम बचा है

यहाँ 
सब बिकता है
कीमत लगाने वाला 
चाहिए
ज़मीर इंसान का
खुले आम बिकता
जिस्म का बाज़ार 
लगा है
इंसान झूंठ से 
सज़ा है
ईमान,धर्म का
सिर्फ नाम बचा है
पैसे से सब मिलता 
अब देश भी बिकता 
हैवान आसानी से
मिलता 
इंसान की जान लेने वाला
चंद पैसों में मिलता 
राजा,रक्षक,दोस्त सब
बिकता 
हर रिश्ता बिकता 
वक़्त बदल गया 
निरंतर बदल रहा है
अब खबर लिखने वाला
खबर छापने वाला
बिकता
कलम पूरी तरह 
बिक जाए 
उस से पहले बता दूं
कई इंसानों का ज़मीर
ज़िंदा है
कुछ माल ऐसा भी है
जो ना बिकता ना
कोई खरीदता
शायद देश उनसे ही
चलता है
04-12-2010

ना मिले ज़मीं पर,तो कोई बात नहीं,इंतज़ार ज़न्नत में भी करूंगा


ना मिले ज़मीं पर
तो इंतज़ार 
ज़न्नत में भी करूंगा
एक दिन तो 
तुम्हें हांसिल कर लूंगा 
तब तक
सब्र से जी लूंगा
खुदा भी मिलता नहीं
लोगों को
क्या वो भूलते हैं
खुदा को
तुम भी खुदा मेरे लिए
निरंतर इबादत 
करूंगा
जब तक ना मिलो
इंतज़ार करूंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
04-12-2010

जुदा भी हुए तो,चैन से ना रहोगे तुम

जुदा हो गए तो भी
चैन से ना रहोगे तुम
अपने ज़मीर को क्या
जवाब दोगे तुम
आँखों से अश्क़ बहेंगे
उन्हें कैसे रोकेगे तुम
खुद से ही गीला होगा
खुद को माफ़
कैसे करोगे तुम
जब दूरियां जलाने लगे
लौट कर आजाना
मोहब्बत की किश्ती को
साहिल तक पहुंचाना
जो सितम ढाये तुमने
जहाँ में नहीं रखेंगे हम
दिल से चाहा है
चाहते रहेंगे हम
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,मोहब्बत,BOOK

अब जो भी कह रहा हूँ,नहीं कह रहा नादानी में

खो दिए
दोस्त बहुत
जिन्दगी में
कुछ खुदा ने छीने
कुछ खो दिए 
नादानी में
जब भी आता है,
नाम उनका जहन में
कुछ वाकये याद आते हैं
जो किए थे साथ 
नादानी में
निरंतर रंज होता है
दिल में
क्यों खो दिया 
उन्हें नादानी में
दुआ खुदा से करता हूँ
फिर भेज दे 
उन्हें मेरी दुनिया में
मिल बैठ 
शिकवे दूर करेंगे
जो किये थे नादानी में
इक अजीब सी चाहत
उठती है दिल में
मिलने की इच्छा
होती दिल में
अब नहीं मिलूंगा 
नादानी में
बहुत जी लिया, 
बहुत रो लिया नादानी में
अब जो भी कह रहा हूँ
नहीं कह रहा हूँ 
नादानी में
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नादानी,जीवन,दोस्त, 
04-12-2010

हर शाम जलते है,मगर रोशन नहीं होते



हर शाम जलते हैं
मगर रोशन नहीं होते
किसी तरह मायूसी
दूर करते हैं
आसमान देखते हैं
चाँद सितारों से बात
करते हैं
किसी तरह सुकून ढूंढते हैं
उनका इंतज़ार करते है
दोपहर के सूरज को चाँद
सुबह को शाम समझते हैं
इतना भी याद नहीं रखते 
जो कभी थे ही नहीं
जिन्हें कभी देखा नहीं
जिनसे कभी मिले नहीं
उन्हें क्यों याद करते हैं
क्यों ख़्वाबों को हकीकत
समझने लगते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
04-12-2010
मायूसी, सुकून, ख़्वाब, शायरी,यादें,ख्वाब, good,