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शनिवार, 27 नवंबर 2010

अब लफ्जों से ना मारो,कुछ अच्छा भी सुन लेने दो

चाहे खंजर से
मार दो
जख्म जिस्म पर
दे दो
पर लफ्जों से
ना मारो
सिर्फ ख्याल बचे हैं
  कमर उनकी ना तोड़ो 
थोड़ा मिठास रहने दो
गम पहले ही बहुत
जिन्दगी में
उनको बर्दाश्त कर 
लेने दो
निरंतर वार पर वार 
हुए दिल पर
उनको सहलाने दो
लब्ज ही बचे हैं
उनको तो कहने दो
दो बातें मीठी
कर लो 
 स्वाद उनमें रहने दो
अब लफ्जों से
ना मारो
कुछ अच्छा भी सुन
लेने दो
27-11-2010

फिर मोहब्बत ना हो,ऐसा इंतजाम कर दो

मेरे
हाल पर ना
मुस्कराओ
जख्मों को ना छेड़ो
ना याद अफ़साने
दिलाओ
अब शोर ना मचाओ
खामोशी अब सनम 
मेरा 
अकेलापन साथ  मेरा
दिल आराम से है
दर्द उस का ना जगाओ
बीते वक़्त में,ना लौटाओ
अरमान सो रहे हैं
फिर से उन्हें ना उठाओ
गाफिल मोहब्बत में था
ना सुकून था,ना ख्याल
खुद का 
निरंतर जिया दूसरों
के लिए
अब खुद के लिए
जीने दो
अहसास ज़िन्दगी का
होने दो 
फिर मोहब्बत 
ना हो
ऐसा इंतजाम 
कर दो
27-11-2010
 

कभी पलकों पर बिठाया था,नूर आँखों का बनाया था

कभी पलकों पर बिठाया था
नूर आँखों का बनाया था
क्यूं अब ये मज़ाक किया
मोहब्बत का कैसा सिला दिया 
आंसू समझ कर गिरा दिया
दिल से  वज़ूद ही हटा दिया 
कभी तुम्हारे दिल में बसा था 
आज क़दमों में पड़ा हूँ 
उम्मीद में जी रहा हूँ 
कभी तो ख्याल आयेगा
दिल तुम्हारा भी पसीजेगा
मुझे अपने हाथों से उठाओगे
गले से लगाओगे
फिर से दिल में बसाओगे 
आँखों का नूर बनाओगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्यार,मोहब्बत,नूर,दिल,
27-11-2010

मेरी तमन्नाओ का नगर लुट गया,दिल आज मेरा टूट गया

मेरी तमन्नाओ का
नगर आज लुट गया
दिल आज टूट गया
न जाने किस्मत ने
क्यूँ ऐसा बदला लिया
जीना ही दुश्वार हो गया
चलो जो भी हुआ
अच्छा ही हुआ
मोहब्बत के नाम से
पर्दा तो उठ गया
किसी का ख्वाब तो पूरा हुआ
बहुत यकीन था मुझे तुम पर
अच्छा हुआ जो
खुद तुमने उठा दिया
मोहब्बत का सिला
बेवफाई के तोहफे से दिया
ज़हन में फिर भी सुकून है
दिल किसी का तो
तुमने खुश किया
मेरी तमन्नाओ का
नगर आज लुट गया
दिल आज  टूट गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत,बेवफाई ,प्यार
27-11-2010

फिर क्यों बेरहमी इतनी दिखाई,जलते दिए की लौ बुझाई


जानता हूँ खुदा ने
उन्हें बुलाया होगा
फरिश्तों ने जन्नत में
पहुंचाया होगा
निरंतर दुआ
खुदा से
करता हूँ
उन्हें वापस ज़मीं
पर भेज दे
सुकून मेरा लौटा
दे
फरिश्तों ने भी मोहब्बत
की होगी
ज़िन्दगी उन्होंने भी
जी होगी
जुदाई कभी तो
सही होगी
फिर क्यों बेरहमी
इतनी दिखाई
जलते दिए की
लौ बुझाई
27-11-2010

ज़िन्दगी अब रोज़ मरती,लम्हा लम्हा दफ़न होती

ये शाम
की तन्हाइयां
ये रात का अन्धेरा
हैरान करता
ना बैठने देता
ना उठने देता
जलजला जहन
में मचाता
रात कटती नहीं
नींद आती नहीं
चांदनी आग उगलती
निरंतर खामोशी में
शोर मचाती
ज़िन्दगी अब रोज़
मरती
लम्हा लम्हा दफ़न
होती
27-11-2010  

ऐ दिल अब दुआ खुदा से कर,रास्ता अब कोई बचा नहीं

दिल अब दुआ
खुदा से कर
रास्ता अब कोई बचा नहीं
सिला मोहब्बत का
जो मुझे मिला
किसी और को ना मिले
दिल किसी का ना टूटे
दुनिया किसी की ना उजड़े
गम जुदाई का दुनिया से
उठा ले
नाम मोहब्बत का
बदल दे
निरंतर रुलाया है
ख़्वाबों को तोड़ा है
ऐसा मंजर अब और
ना दिखा
अफ़साना ऐसा और
ना बना
27-11-2010