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शनिवार, 20 नवंबर 2010

ज़िन्दगी की शाम को निखारा जाए

आओ ज़िन्दगी की
शाम को निखारा जाए
उस पर लगे दाग
धब्बों को मिटाया जाए
मन के धुंधलेपन को
हटाया जाए
सहारे बिना जिया जाए
भविष्य
उज्जवल बनाया जाए
रिश्तों को
प्यार से निभाया जाए
त्रुटियों की
क्षमा मांगी जाए
ईर्ष्या द्वेष से
मुक्त हुआ जाए
बुढापे क सुखद
संतुष्टि को
लक्ष्य बनाया जाए
निरंतर
काम दूसरों के आएँ
उन्हें भी
रास्ता यही दिखाएँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,बुढ़ापा,BOOK
20-11-2010

हर कोई सुबह का इंतज़ार करता,आज से कल बेहतर हो यही सोचता

रात में
क्या नहीं होता
चाँद का निकलना
तारों का झिलमिलाना होता
माहौल में अजीब सा सन्नाटा होता  
कोई चैन से सोता,कोई बेचैन रोता
किसी की आँखों में,नींद का नाम नहीं
तो किसी को,नींद का इंतज़ार नहीं
कहीं अस्मत लुट रही
कहीं मस्ती हो रही
चोर अपना काम कर रहे
रक्षा करने वाले,चौकन्ना हो जग रहे
हर कोई सुबह का,इंतज़ार करता
आज से कल बेहतर हो
यही सोचता
20-11-2010

शायद फिर मुलाक़ात हो,इस उम्मीद में निरंतर वहाँ लौटता हूँ

तुमसे 
 पहली मुलाक़ात
मुझे याद है
हम,तुम खड़े थे
बरसात से बचने के लिए
तुम्हें इशारे से बुलाया था.
सहमते हुए तुम आयीं
छाते में साथ खडी हुईं
सुकचा रही थीं,घबरा रही थीं
थोड़े देर में सहज हुईं
वर्षा रुकी
तुमने चाय का निमंत्रण दिया
मैंने हाँ में सर हिलाया
ढाबे में बैठ,एक दूसरे को जाना
विचार और शौक को पहचाना
हम उठे,फिर मिलने का
वादा किया
तब से अब तक जुदा हैं
फिर मिलना ना हुआ
अरमान अधूरा रहा
रोज़ याद करता हूँ
पहली मुलाक़ात नहीं भूलता हूँ
बरसात में अब भी
उस जगह पर जा खडा होता हूँ
सड़क के दोनों तरफ देखता हूँ
इंतज़ार में वक़्त गुजारता हूँ
शायद फिर मुलाक़ात हो
इस उम्मीद में निरंतर
वहाँ लौटता हूँ
2011-2010

कभी खामोश रहते हैं,कभी खुल कर चहकते हैं

वो
सोच में खामोश हैं
या ख़्वाबों में खोये हैं
दिल में रो रहे हैं या
ख्वाबों में हमें देख रहे हैं
अंदाज़ उनका समझ
नहीं आता
दिल में क्या है
पता नहीं पड़ता
कभी खामोश रहते हैं
कभी खुल कर चहकते हैं
कभी  इशारों से बुलाते हैं
नज़दीक होते हैं तो
बेरुखी दिखाते हैं
निरंतर धूप छाँव के
इस खेल में
निरंतर मोहरा हमें
बनाते हैं
ना हाँ करते हैं ना
ना करते हैं
20-11-2010