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शनिवार, 13 नवंबर 2010

दोहरापन जीने का तरीका हो गया


निर्मल मन 
अब मलीन हो गया
सुन्दर चेहरा 
मुरझा गया
वक़्त की तेज धूप में
झुलस गया 
ज़माने का दस्तूर
बदल गया
सच अब मर गया
होड़ में बेहतर 
दिखने के लिए
बनावट का सहारा
रह गया
झूंठ बोलना आदत
बन गया
हकीकत छिपाना 
मजबूरी बन गया
दोहरापन जीने का 
तरीका हो गया
चेहरे पर चेहरा लगाना
ज़रूरी हो गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
13-11-2010

मन परेशाँ,दिल बेचैन है



मन परेशाँ,
दिल बेचैन है
दिल को यकीन है 
मुश्किल से मुझे 
भुलाया होगा
रो रो कर वक़्त 
काटा होगा
खुद पर गुस्सा 
आया होगा
खुद को कोसा होगा
कोई तो कारण 
रहा होगा
सीने में दबा रखा होगा
खून का घूँट पी 
दिल को समझाया होगा
मुझे तकलीफ ना पहुंचे
 सोचा होगा
मर मर कर जीते 
होंगे 
हर लम्हां तड़पते 
होंगे
मजबूरी में मुझे, 
भुलाया होगा
सहारा किसी का, 
लिया होगा
13-11-2010

एक ध्येय एक उद्देश्य से,ख़्वाबों को पूरा करने में लगा हुआ है


ये
आंधी तूफ़ान
उफनता समंदर
कड़कता आसमान
 
अकेला नाव खे रहा
साहिल अपना ढूंढ रहा
ना किनारा दिख रहा
ना सहारा मिल रहा
अकेला मंजिल की और
बढ़ रहा
निरंतर कोशिश
वहाँ पहुँचने की कर रहा
मौसम खराब
नाव खेना मुश्किल
हिम्मत से  डटा हुआ
एक ध्येय एक उद्देश्य से
ख़्वाबों को पूरा करने में
लगा हुआ है
13-11-2010

परिंदे फडफडा रहे हैं,बहेलिये घूम रहे हैं



परिंदे
फडफडा रहे हैं
बहेलिये
घूम रहे हैं
पता नहीं
कब जाल में फाँस लें
कब ज़िन्दगी ले लें
चौकन्ना रहना है
अब श्वान सा
सोना है
बगुले सा ध्यान 
लगाना है
निरंतर तैयार
रहना है

परिस्थीति कैसी भी हो
हिम्मत से जीना है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
13-11-2010
श्वान = कुत्ता

सिर्फ आज की सोचने दो,जो मन में आये कर लेने दो

लोग
पेड़ की छाया में
रहते हैं
फल उस के खाते हैं
उस को काटते हैं
अहम् के लिए आहत उसे
करते हैं
जान उस की लेते हैं
वक़्त का तकाजा है
सिर्फ अपना ही सोचना है
निरंतर खुद को पनपाना है 
क्या गलत कर रहे हैं
तुमने फ़र्ज़ अपना निभाया
हम भी निभा देंगे
जो पलेंगे हमारी छाँव में
उनको भी काटने देंगे
जो कर रहे हैं
सज़ा उस की भुगत लेंगे
वक़्त आने पर देख लेंगे
सिर्फ आज की सोचने दो
जो मन में आये
कर लेने दो
13-11-2010 

सुना था भगवान् जन्नत में बसते हैं

सुना था
भगवान् जन्नत में
बसते हैं 
शैतान सिर्फ दोजख में
रहते हैं
दोजख के बाशिंदे अब 
ज़मीन पर दिखते हैं
इंसानों में अब आम
मिलते हैं
लोग पत्थर को पूजते हैं
उस में भगवान् ढूंढते हैं
इंसान पत्थर से 
बदतर हो गए
निरंतर शैतान को पूजते हैं
उसके रास्ते पर चलते हैं
 तमन्ना ज़न्नत की
रखते हैं
13-11-2010

मुझे नहीं पता वो तन्हा क्यों हैं

मुझे नहीं पता
वो तन्हा क्यों हैं
सब कुछ दिया खुदा ने
फिर भी खफा क्यों हैं
हर लम्हां उन्हें
चाहा है
फिर भी ग़मज़दा
क्यों है
क्या ऐसा सहा है
क्या भुगता है
खामोश लबों से
कहाँ पता पड़ता है
कोई तो बताये
गम-ऐ-राज़ क्या है
निरंतर चहकने वाला
चुपचाप क्यों है
हमसाया आज साया
क्यों है
13-11-2010