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शनिवार, 6 नवंबर 2010

क्यों इंसान धन के खातिर,ज़िन्दगी बर्बाद करता है,निरंतर मर मर कर जीता है


जेठ 
की दो पहर में,
बियाँबान जंगल में
पेड़ के नीचे
थकान से चूर राहगीर
बैठा था
सफ़र अभी अधूरा था
वो नितांत अकेला था
प्यास से गला सूख रहा था
दो बूँद पानी को तरस रहा था
साथ में थैला था,धन से भरा था
समय की सुई बढ़ने लगी
बिना पानी हालत खराब होने लगी
जान जाने लगी
परमात्मा की याद आने लगी
मन ही मन प्रार्थना करने लगा
धन से भरा थैला ले ले
प्यासे की प्यास बुझा दे
किसी तरह जान बचा दे
दो बूँद पानी की कीमत
धन से भी ज्यादा हो सकती है
आज पता चला
धन कितना भी हो
छोटी से छोटी चीज़ का भी
महत्त्व होता है
धन सब कुछ नहीं होता
क्यों इंसान धन के खातिर
ज़िन्दगी बर्बाद करता है
निरंतर मर मर कर
जीता है
06-11-2010


आशिकी निरंतर नए मंज़र दिखाती है,कभी शाम को भी सुबह होती है


परेशाँ हूँ
दो राहे पर खडा हूँ
उधर उन की बेरुखी
इधर दिल पर 
नए क़द्रदान की
दस्तक
हैरान हो रहा हूँ
क्या उन्हें रुखसत करूँ?
या इन्हें हाँ भरूँ?
मिजाज़-ऐ-आशिकी में
ऐसा भी होता है
एक का जाना
दूसरे का आना होता है
खोना पाना साथ होता है
आशिकी निरंतर 
नए मंज़र दिखाती है
कभी शाम को भी
सुबह हो जाती है 
06-11-2010     
आशिकी,मोहब्बत ,प्यार 
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर, 

दिल है की मानता नहीं


दिल है
कि मानता नहीं
सिवाय इश्क
कुछ जानता नहीं
शराब सिर्फ गला तर करती
अब नशा आता नहीं
अब जाम -ऐ-मोहब्बत
साकी के हाथ से चाहिए
ज़िन्दगी में
सिर्फ इश्क चाहिए
निरंतर इश्क ही सोया
इश्क ही पिया ,
इश्क में खोया,
इश्क में जिया
दिल है कि मानता नहीं
सिवाय इश्क
कुछ जानता नहीं
06-11-2010
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर     

दिल और दिमाग में झगडा हुआ,दिमाग बोला दिल से,तुझे क्या चाहिए


दिल और दिमाग में
झगडा हुआ
दिमाग बोला दिल से
तुझे क्या चाहिए
दिल ने जवाब दिया
 दिमाग में सुकून चाहिए
दिमाग बोला
अपने पर काबू रखा करो
ज्यादा ना मचला करो
दिल बोला 
तुम्ही रास्ता दिखाते हो
ज्यादा सोचते हो
खुद परेशाँ होते हो
निरंतर मुझे भी परेशाँ
करते हो
में तो दिल हूँ
दिल से दिल लगाता हूँ
अपने आप से मजबूर हूँ
दरवाज़ा खुला रखता हूँ
जो भी आ जाए
प्यार से उसे
रखता हूँ
06-11-2010
E




हांसिल कुछ किया नहीं, साहिल फिर भी बदला नहीं


दिल
तुम से लगाया
धोखा भी खाया
बदनाम भी हुआ
फिर भी पछताया 
नहीं
ख्वाब देखना बंद किया
नहीं
जब दिल ही दे दिया
कुछ भी हो जाए
चाहना कम किया
नहीं
हांसिल कुछ किया
नहीं
साहिल फिर भी बदला
नहीं
निरंतर कोशिश करना
छोड़ा नहीं

06-11-2010

अब इंसान में,हैवान दिखता, हर शख्श कातिल दिखता

अब
उन्हें होश नहीं आता
यकीन किसी पर
नहीं आता
ख्वाब  भी कोई
नहीं आता
आँखों में अश्क
नहीं आता
यकीन खुद से भी
उठ गया
कोई अपना नज़र
नहीं आता
ऐतबार किसी पर
नहीं होता
मतलब मोहब्बत का
समझ नहीं आता
अब इंसान में,हैवान दिखता
हर शख्श कातिल
दिखता
06-11-2010

शौक-ऐ-मोहब्बत से जीने वालों को ये कैसा तोहफा दिया, यकीन मोहब्बत से उठा दिया

रो रो कर
सुबह को शाम किया
हर लम्हा तुम्हें
याद किया
निरंतर दिल से
सलाम किया
ऐतबार पूरा किया
क्यूं फिर हमें
बदनाम किया?
क्या ऐसा गुनाह किया?
जो मोहब्बत को
किस्सा-ऐ-आम किया
गुलशन को उजाड़ दिया
गुल को टहनी से
जुदा किया
शौक-ऐ-मोहब्बत से
जीने वालों को
ये कैसा तोहफा दिया
यकीन मोहब्बत से
उठा दिया
06-11-2010
शौक-ऐ-मोहब्बत=मोहब्बत का शौक

आज चैन खोता नहीं तूँ, आराम से सोता तूँ



क्यों
ख़्वाहिश के बीज
बोता हैं तूँ
इश्क के जाल में,
फंसता है तूँ
नींद अपनी खोता हैं तूँ
ख्वाब देखता है तूँ
इंतज़ार रोज़ करता है तूँ
वो आते नहीं तो 
रोता है तूँ
इब्तिदा-ए-इश्क़ से 
पहले सोचता तूँ
यादें दिल में रखता नहीं तूँ
आज चैन खोता नहीं तूँ
आराम से सोता तूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-11-2010

इब्तदा-ऐ-इश्क= इच्छाओं के बीज
मोहब्बत,यादें ,शायरी ,चैन  

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

ख्वाब कितने भी देखो निरंतर, इक दिन रह जाएगा सिर्फ अफ़साना



माशूकों
के जलवो से खुद
को बचाना
 दिल को तीर-ऐ-निगाह
से बचाना
सबूत अपनी वफ़ा
का दोगे
तमगा बेवफा का तुम 
को मिलेगा
जुबाँ से कितना भी
मीठा बोलोगे
ताना फिर भी सुन
ना पडेगा
जुदा चाहे वो हो
जाएँ
ऊंगली तुम पर उठाएगा
ज़माना
 ख्वाब कितने भी देखो
निरंतर
इक दिन रह जाएगा
सिर्फ अफ़साना
05-11-2010 

इंतज़ार किसी और का किया,हमें यूँ ही छोड़ दिया


तुम
भी आरजू कोई
रखते होगे
नाम किसी का ले  के
आहें भरते होगे
दिल में किसी को
बसाते होगे
कभी कभी चुपचाप रोते होगे
प्यार किसी से करते होगे
ख़्वाबों में बुलाते होगे
निरंतर सपने ख्वाब नए
बुनते होगे
जो हमने प्यार तुम से
किया
कौन सा गुनाह किया
हम ने भी वो ही किया
जो तुमने किया
ये बात जुदा है
तुमने साहिल बदल
लिया
इंतज़ार किसी और का
किया
हमें यूँ ही छोड़ दिया
05-11-2010