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शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

उनको गए ज़माना हो गया,किस्सा फिर भी पुराना ना हुआ

उनको जुदा हुए
ज़माना हो गया
किस्सा फिर भी
पुराना ना हुआ
अब भी रोज़
ख्यालों में आती हैं
जहन के दरवाज़े को
खटखटाती है
अपने वज़ूद का
अहसास कराती है
नयी उम्मीद दिलाती है
यादों को ताज़ा रखती है
मोहब्बत की आग को
बुझने नहीं देती हैं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत,यादें,ख्याल,जुदाई,शायरी
24-10-2010

माशूकों के करिश्मे से सहम गया हूँ





किश्ती में साथ बैठे थे

किश्ती डूब गयी
वो तैर कर किनारे

 पहुँच गए 
हम भंवर में फँस गए
अब अपनी जान बचानी है

नयी किश्ती ढूंढनी है 
ज़िन्दगी भी जीनी है
बच भी गया तो
उन्हें कैसे भूल पाऊंगा
यादें कैसे मिटाऊंगा
वो जज्बा कहाँ से लाऊंगा
जो निरंतर साथ रहे
वो पतवार कहाँ से लाऊंगा
मंझधार में ना छोड़े
ऐसा मांझी कहाँ से लाऊँगा
अब डर गया हूँ
बेवफाई से घबरा गया हूँ
माशूकों के करिश्मे से
सहम गया हूँ
23-10-2010

हास्य कविता -भैया,आपके रिश्ते के मामा की बेटी हूँ



हास्य कविता 
वो ऊपर बर्थ पर लेटी थी
मैं नीचे सीट पर बैठा था
वो  आशा  से मुझे  देख रही थी
कभी कभी मुस्करा रही थी
दिल में,कुछ कुछ होने लगा
मन ही मन खुश होने लगा
प्रेम का आगाज़ होने लगा
तभी वो बोली
आप हंसमुख जी  हैं
मैंने पूँछा
आप को कैसे पता चला
जवाब मिला
भैया,आपके रिश्ते के 
मामा की बेटी हूँ
विदेश में रहती हूँ
पहली बार भारत आयी हूँ
निरंतर परिवार की
तस्वीरों में आपको देखा है
इसलिए आसानी से
पहचाना है
23-10-2010

दिल में क्या है,बताने की कोशिश करता हूँ


मेरा दिल 
एक खुली किताब है
कोई पड़े तो सही
हर लिखी इबरात में
यही पैगाम है
पढने के लिए खुला दिल
खुला दिमाग चाहिए
अगर पड़ोगे बंद
दिल-ओ-दिमाग से
कुछ समझ नहीं पाओगे
पड़ने से पहले ही क्या लिखा है
अगर जान जाओगे
लोग कैसे होते हैं
कभी ना समझ पाओगे
निरंतर यही सोचता हूँ
कोशिश बंद दिमागों को
खोलने की करता हूँ
दिल में क्या है
बताने  की कोशिश
करता हूँ
23-10-2010

अतीत को याद कर जीते थे,बुढापे में सहारा ढूंढते थे


वो  दो  थे
एक हुए
बच्चे के माँ,बाप बने
अब तीन हुए
बच्चे में तल्लीन हुए
उठने से सोने तक
उस में ही लीन हुए
निरंतर सपने देखते थे
बच्चे में बुढापे का,सहारा ढूंढते थे
वक़्त के साथ बच्चा बड़ा हुआ
पड़ लिख कर युवा हुआ
वास्ते नौकरी, 
विदेश को विदा हुआ
अब वो फिर अकेले थे
अतीत को याद कर
जीते थे
बुढापे में सहारा
ढूंढते थे
23-10-2010

जमाने भर में किया बदनाम,अब पैग़ाम भेजते हैं


हर
जगह अब मेरा
पता पूंछते हैं
हर गली मोहल्ले में
मुझे ढूंढते हैं
हाल लोगों से मेरा 
जानते हैं  
खुद ही जुदा हुए थे
 आने का बहाना ढूंढते हैं
जमाने भर में,किया बदनाम
अब पैग़ाम भेजते हैं
हर निशानी मिटा दी मेरी
अब तोहफा भेजते हैं
पहले जख्म दिए
अब मलहम लगाते है
निरंतर रुलाने वाले
अब खुद रोते हैं
23-10-2010



  





हास्य कविता-सपने में भी पहलवान दिखता है




हास्य कविता
=========

  हँसमुखजी  
 डाक्टर से बोले
नींद नहीं आती, 
मन नहीं लगता,
चैन खो गया है
अजीब सा डर लगता है
मुझे कुछ हो गया है
डाक्टर बोला आप को
इश्क का बुखार हो गया है
फौरन इश्क कर लो
अपना इलाज खुद कर लो
  हँसमुखजी बोले,
इश्क तो हो गया था
मिलना जुलना भी 
शुरू हो गया था
उसके पहलवान भाई को
पता चल गया
एक दिन घर आया
बोला पीछा छोडोगे
या हाथ पैर तुड्वाओगे
अपनी ऐसी की तैसी,
करवाओगे
तब से निरंतर,
अजीब सा लगता है
जीने का मन नहीं करता है
सपने में भी मुझे 
पहलवान दिखता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
23-10-2010

कातिल की रूह ने,प्रेमी की रूह से पूंछा

कातिल की रूह ने, 
प्रेमी की रूह से पूंछा
मैंने क़त्ल किया
नर्क में उस की सज़ा,भुगत रहा हूँ
तुम नर्क में क्या कर रहे हो?
तुमने प्यार में धोखा खाया
जुदाई का दर्द सहा
बेवफाई का स्वाद चखा
इश्क के खेल में,सब सहा
प्रेमी की रूह ने,जवाब दिया
खुदा से भी मैंने,यही पूंछा था
इस पर खुदा ने कहा
जब ज़मीन पर तुमने इश्क किया
नाकामी में सब सहा
वो नर्क में रहने से कम नहीं था
मैंने सोचा अब तुम्हें
निरंतर नहीं मरना होगा
इंतज़ार किसी का न करना होगा
जुदाई का दर्द न सहना होगा
किसी अप्सरा का दीदार ना होगा
फिर इश्क के जाल में
ना फंसना होगा
स्वर्ग से बेहतर जीवन
यहीं मिलेगा
23-10-2010