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शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

इंसान का इश्वर को तोहफा कह लाएगा


 शेरा
कॉमनवैल्थ खेलों का
प्रतीक है
लोगों के लिए आनंद और कौतूहल
की चीज़ है
जंगल काटे जा रहे हैं
शेर निरंतर मारे जा रहे हैं
संख्या में कम हो रहे हैं
कम से कम खेलों के नाम पर
याद तो आ रहे हैं
जितना ध्यान खेलों पर है
उतना जानवर और जंगल
पर हो
तो पर्यावरण और जंगल
बच जाएगा
एक नया युग आयेगा
इंसान का,इश्वर को तोहफा
कह लाएगा
09-10-2010

एक अबला हत्या,बलात्कार की शिकार हुई


एक अबला
हत्या,बलात्कार की शिकार हुई
बलात्कारी हत्यारे को सजा हुई
न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुई
फाइल भी बंद हुई
किसी की बेटी गयी,
किसी की बहन गयी
कुछ वर्षों बाद अपराधी
बाहर आएगा
अपराध मुक्त हो जाएगा
कोई नहीं जानता फिर
कौन सा नया तांडव मचाएगा ?
किसे अपना शिकार बनाएगा?
हालात मन को कचोटते हैं
विचारों को झकझोरते हैं
कब व्यवस्था में बदलाव होगा?
कब इस व्यथा का अंत होगा?
कब नारी को सम्मान मिलेगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-10-2010
बलात्कार,स्त्री ,नारी ,महिला ,न्याय

विधि का विधान बड़ा अजीब होता है


विधि का विधान
बड़ा अजीब होता है
गाँधी के देश में
माओवाद पनपता है
बुद्ध महावीर की धरती पर
हिंसा का नाच होता है
धर्म के
नाम पर धंधा होता है
गरीब के घर
अब्दुल कलाम पैदा होता है
अन्न पैदा
करने वाला किसान
आत्म ह्त्या करता है
जहाँ गरीब एक एक
पैसे का मोहताज होता है
वहाँ पूँजी पतियों का
साम्राज्य होता है
अभिनेता के घर
अभिनेता
नेता के घर नेता
पैदा होता है
नेता का हर रिश्तेदार
नेता होता है
चुनाव में टिकट
उसको ही मिलता है
भ्रष्टाचार
जीने का तरीका होता है
विधि का विधान देख
हैरान होता हूँ
रोज़ परमात्मा से
यही सवाल करता हूँ
विधि का विधान
इतना अजीब क्यों होता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
देश ,विधि का विधान,
09-10-2010

असंवेदनशील (काव्यात्मक लघु कथा)

(काव्यात्मक लघु कथा)
पैबंद लगे
पुराने कपडे पहने
वो हर दिन
स्कूल की छुट्टी के बाद
बिजली के खम्बे के
नीचे खड़े हो कर
आशाओं से  दृष्टि से
खोमचों को घेरे,
बच्चों को देखता था
जिज्ञासावश एक दिन
उस से पूछ लिया
कुछ खाओगे?
वो बोला नहीं
निरंतर यही होता था
मैं पूंछता,
वो मना कर देता
एक दिन रहा ना गया,
पूँछ ही लिया
क्या करते हो ?
कहाँ रहते हो?
वो बोला भिखारी नहीं हूँ
अनाथ हूँ
बगल के घर में रहता हूँ
वहीँ काम करता हूँ
मैं भी पढ़ना चाहता हूँ
इन की तरह
स्कूल जाना चाहता हूँ
बच्चों को हँसते खेलते
देख कर खुश होता हूँ
पर सब मुझे
भिखारी समझते हैं
केवल खाने के लिए
पूँछते हैं,
मैं भी पढ़ लिख कर
कुछ बनना चाहता हूँ
मैं शर्म से गढ़ गया
सोचने लगा
ना जाने क्यों हम इतने
असंवेदनशील हो जाते है
गरीब वंचित लोगों को
एक नज़र से देखते हैं
उनकी मज़बूरी का
अहसास नहीं करते हैं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-10-201
वंचित,गरीब,निर्धन,selected

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

मंजिल अपनी पा ही लूंगा




 उनसे
बात  क्या करी
चर्चा शहर में हो गयी
दिल की निकली भी नहीं
की बात आम हो गयी
हर बार किस्सा यही होता है
शुरू होने से पहले,ख़त्म होता है
नज़रें लोगों की मुझ पर रहती हैं
मेरी चाहत से,नफरत होती है
निरंतर रास्ते नए ढूंढता हूँ
चेहरा भी नया ढूंढता  हूँ
ना देखा जाऊं ऐसा,
इंतजाम करता हूँ
कामयाब इस बार हो जाऊं
ऐसा सोचता हूँ,
कोशिश में लगा हूँ
वो थक जायेंगे,मैं ना  थकूंगा
मंजिल अपनी पा ही लूंगा
08-10-2010

ख्वाब अब हकीकत बन जाए,बीमार की दवा बन जाए


हर आहट 
उसकी आहट लगती है 
हर गीत में आवाज़
उसकी ही लगती है
रग़ रग़ में बस गयी है
दिल की 
धड़कन बन गयी है 
जुबाँ पर 
नाम उसका ही आता है
खवाबों में 
वो ही दिखती है
ख्यालों में वो ही रहती है
हर सूरत 
उसकी ही लगती है
हर लम्हा 
दिल के पास पाता हूँ
दुआ खुदा से करता हूँ 
हसरतों को 
मंज़िल मिल जाए
ख्वाब अब 
हकीकत बन जाए
बीमार-ऐ-इश्क़ की 
दवा बन जाए
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत ,प्यार,शायरी
08-10-2010

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

न्याय में आस्था रखी है,आस्था बनाए रखेंगे

   मरने वाला मर गया,
  मारने वाला बच गया
किसने मारा?यह तय हो गया
क्यों मारा?यह भी तय हो गया
क्यों कि
 रेअरस्ट ऑफ दी रेअर क्राइम
नहीं है
इसलिए अदालत ने 
मौत की सज़ा,
उम्र क़ैद में बदली है  
मारने वाले को हाई कोर्ट के
फैसले से राहत दी है
हमें कानून का सम्मान 
करना चाहिए
जो मरा उसके परिवार को,
सांत्वना देनी चाहिए
एक जीवन का अंत हुआ
एक केस का समापन हुआ
निरंतर फैसले आते हैं
आते रहेंगे
न्याय में आस्था रखी है
आस्था बनाए रखेंगे 
07-10-2010
(देश के कानून का सम्मान करते हुए,भावनाओं की अभिव्यक्ती,कर रहा हूँ  यह रचना न्याय प्रक्रिया या किसी भी न्यायिक  फैसले  पर टिप्पणी नहीं है)

सुना है,न्याय में देरी से न्याय का हनन होता है


    प्रियदर्शिनी चली गयी 
सवाल खडा कर गयी
कब तक अन्याय
न्याय को हराएगा
कब तक यूँ ही रुलाएगा
कब तक गत ये बनाएगा
वो दिन कब आयेगा
जब न्याय,अन्याय को
मिटाएगा
सुना है न्याय में देरी से
न्याय का हनन होता है
जिन्हें यहाँ नहीं मिला
उन्हें  वहाँ मिलता है
 व्यथित सब देख रहा हूँ
न्याय कब जीतेगा
निरंतर यह सोच रहा हूँ
07-10-2010
(देश के कानून का सम्मान करते हुए,केवल मात्र एक माँ बाप की भावनाओं की अभिव्यक्ती,कर रहा हूँ  यह रचना न्याय प्रक्रिया या किसी भी न्यायिक  फैसले  पर टिप्पणी नहीं है)

इंसान की मौत के साथ ही दफ़न होता है

टूटा कांच
कभी जुड़ नहीं सकता
जुड़े तो भी दरार से,बच नहीं सकता
दोबारा टूटे
तो चूर चूर होता है
टूटे दिल का
भी यही हाल होता है
लाख जोड़ो
कोने में फिर भी इक
शोला दबा रहता है
पानी कितना भी डालो
धुंआ  फिर भी होता है
जो फिर टूटे तो,राख  होता है
निरंतर आग पानी का खेल
चुप चाप चलता है
इंसान की मौत के साथ ही
दफ़न होता है
07-10-2010

आम की बात हर ख़ास तक पहुंचाना चाहता हूँ

मुझे
ना हिंदी आती है,
ना उर्दू आती है
आम आदमी की भाषा आती है
वही बोलता हूँ,वही लिखता हूँ
भाषा और अभिव्यक्ति की
स्वतन्त्रता चाहता हूँ
आम की बात हर ख़ास तक
पहुंचाना चाहता हूँ
जो ना समझे,
उसे समझाना चाहता हूँ
निरंतर आम और ख़ास में बढ़ रही
दूरियोँ को घटाना चाहता हूँ
खुले दिल से
दिल में क्या है,बताना चाहता हूँ
जो माने उस को नमन
जो ना माने उसको भी नमन
07-10-2010

बिना इंसानों का देश कैसा लगेगा


एक आदिवासी हूँ
इस देश का वासी हूँ
मेरे दर्द को जानों
दुःख पहचानो 
खेत गए 
खलिहान गए,
पेड़ पौधे गए
धरती माँ के पेट से 
खनिज लवण गए
कारखाने बन गए,
नए नगर बस गए
मैं  वहाँ का वहाँ खडा हूँ
पहले से चौथाई बचा हूँ
विकास के नाम पर
मुझे ना उजाडो
विकास जरूरी है
तो जीवन भी जरूरी है
विकास यात्रा में,
मुझे भी साथ ले लो
क्या चाहता हूँ,
मुझ से भी पूँछ लो
विकास के तांडव को 
रोक दो
जितना आवश्यक है
उतना ही करो 
ध्यान से सोचो 
जीवन बिना 
विकास व्यर्थ होगा 
इंसानों के बिना 
देश कैसा लगेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
आदिवासी,जीवन,विकास,देश 
07-10-2010