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शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

वृक्षों से धरती को भरना है


मेहता जी के बगीचे में,कल एक वृक्ष लगाया
प्रकृती प्रेम और संतुलन के,लिए यह कार्य किया

मेरे  भाइयों ने वृक्षों को,बेरहमी से काटा है
उन्हें फिर से लगाना है,किसने इन्हें कुछ दिया

सदा इन से ही लिया,अब वक़्त आ गया है
ऋण इनका चुकाना है,पर्यावरण को बचाना है

धरती को हरा बनाना है,अब सबको समझाना  है
कटने से इन्हें बचाना है,

हमारा जीवन बेकार होगा,जो वृक्ष इस तरह कटेगा
निरंतर काम यही करना है
वृक्षों से धरती को भरना है

02-10-2010

मैं टाइगर हूँ ,इस धरती का वासी हूँ

मैं टाइगर हूँ,इस धरती का वासी हूँ
सदियों  से इंसान और जंगल से रिश्ता रहा है
बहादुर हो यह दिखाने के लिए,
मुझ पर,अपने बच्चों का नाम रखते हो
अंध विश्वाशों में पड़,तंत्र मंत्र के नाम पर
मुझे मारना चाहते हो,मिटाना चाहते हो ,
परमात्मा ने तुम्हें और मुझे बनाया
फिर ऐसा क्यों करते हो
उसके नियमों को,क्यों तोड़ते हो
प्रकृति का संतुलन बिगाड़ते हो,
छल कपट से मुझे मारते हो ,
मेरे अस्तित्व को खतरे में डाल,
इंसानियत का पाठ,सब को  पढ़ाते हो
खुद निर्दोष जानवरों को मारते हो
अब तक जो कर दिया,सो कर दिया
   अब पश्चाताप कर डालो 
कुछ ऐसा करो
निरंतर आने वाली पीढियां,
तुम्हें याद करें
 मुझे बचाने के लिए,तुम्हारा सम्मान करें
आओ नारा लगाएँ,एक स्वर में गाएँ
टाइगर बचाना है,नासमझो को समझाना है
मारने वालों को भगाना है,प्यार से रहना  है
मैं  टाइगर हूँ ,
इस  धरती का वासी हूँ

                                                                02-10-2010

गाँधी ने निस्वार्थ किया था


 गाँधी ने निस्वार्थ किया था
हमें भी कुछ करना है 
देश ने दिया हमें सब कुछ
हमें भी  कुछ देना है 
अमन,शान्ति से रहना है
  नया सोच देश को देना  है
जो सिखाया गाँधी ने
अमल में उसको लाना है    
सबको यही सिखाना है
निरंतर, यही  धर्म निभाना  है 
नया भारत  बनाना है
02-10-2010

इबादत का सही तरीका बता दो



या खुदा
तुम्हारे दर पर 
दीवाने आते हैं
अपनी ख्वाहिशें
तुम्हें बताते हैं
कौन तुम्हें चाहता 
कौन नहीं चाहता  
किस की चाहत सच्ची
किसकी चाहत झूठी 
तुम्हें तो मालूम होगा
तुम ही सब को देते हो 
किसे देना है किसे नहीं
यह कैसे तय करते हो ?
जो तुम्हें
दिल से चाहता है 
उसे तो मिलता नहीं 
जो मन से चाहता नहीं 
उसको मिल जाता है 
निरंतर हैरान होता हूँ
आज तुम से पूँछ रहा हूँ
इन्साफ का राज़ बता दो
कैसे तुम पर भरोसा रखूँ
सिर्फ इतना बता दो
या फिर मुझे इबादत का
सही तरीका बता दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

02-10-2010

किस्मत को ही बदल दूंगा


हाथों की लकीरें देखता हूँ,
उसमें  तुम्हें   ढूंढता   हूँ

कोई तो निशान होता होगा,
पता जिस से तुम्हारा पडेगा

कौन लकीरें देख कर बताएगा
कब   मेरा, तुम्हारा  साथ होगा

हाथ पढने वालों को ढूंढ रहा हूँ
हर मिलने वाले से   पूँछ रहा हूँ

नसीब  मेरा खोज  रहा हूँ
शायद कोई दिलासा देगा

झूंठे ही सही,  इशारा करेगा
कब तेरे आने का वक़्त होगा

ये भी अगर  मुमकिन ना हो
तो लकीर की जगह बता दे

नश्तर से खुद बना लूंगा
निरंतर इंतज़ार किया है
कुछ दिन और कर लूंगा

मैंने तय कर  लिया है अब
यहाँ नहीं  तो,वहाँ मिलूंगा
किस्मत को ही  बदल दूंगा
02-10-2010

होठों को मुस्कराहट से सजाओ

क्यों  खुद से ही  रूठे हो
हंसी को मुखड़े पर लाओ
खुद हंसो औरों को हंसाओ 

होठों को मुस्कराहट से सजाओ
देखने वालों को राहत पहुचाओ

ग़मगीन चेहरे किसे भाते हैं
क्यों फिर उसे दर्शाते हो ?

इस से बेहतर और  क्या होगा
जो ख़ुशी किसी को दे पाते हो

ख़ुशी में शामिल होते हो
दर्द  कहाँ  बाँट पाते  हो

दर्द में जो सहारा मिले
टूटे दिल जुड़  जाते हैं

नए जोश नयी उमंग से
फिर आगे बढ़  जाते हैं

सुख देना,दुःख लेना
सब को सहलाता है

निरंतर हिम्मत बंधाता है
जितना बाँट सको बांटो

खूब हंसो और हंसाओ,
इस बदरंग जीवन को,

हर हाल में खुशहाल बनाओ
हंसी  को  मुखड़े  पर लाओ
02-10-2010

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

फूलों का व्यापारी था, फूल बेचना माला गूंथना,धंधा था


फूलों का व्यापारी था,
माला गूंथना
फूल बेचना काम था
जिस सड़क पर उसका
ठिकाना
उस पर मंदिर मस्जिद,
कब्रिस्तान शमशान था
दुल्हे के गले में माला,
उसकी ही सजती थी
चाहे हो जीत खेल में
माला उसकी ही बिकती थी
गम -ख़ुशी दोनों मौकों पर
माला उस की ही चढ़ती थी
ईद  दीवाली बैसाखी
हर त्योंहार पर खुश होता था
अर्थी जनाजा देख
दिल उसका भी रोता था
मौत -त्यौहार पर
फूल ज्यादा बिकते थे
पैसे भी ज्यादा मिलते थे
पर जितना खुश,
त्यौहार पर होता
उस से ज्यादा दुःख
उसे मौत पर होता
निरंतर सुख दुःख,
दोनों में शामिल होता
 हिन्दू था
न मुसलमान था
वो केवल इंसान था
फूलों का व्यापारी था,
माला गूंथना
 फूल बेचना काम था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


01-10-2010
Edited-24-1-2012