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शनिवार, 25 सितंबर 2010

आधी रोटी प्यार की दे दे, भूख मेरी मिट जायेगी

आधी रोटी
प्यार की दे दो
भूख मेरी मिट जायेगी
नफरत की थाली
रहने दे,
हवस की भूख 
बढ़ जायेगी
किस्मत मेरी अच्छी है
आधी तो मिल रही
मुझ को
बदकिस्मत तो वो हैं
एक कौर भी
नसीब नहीं जिनको
मेरे हिस्से की आधी
उनको  दे दो,
कोई अपना भी है 
ये अहसास उनको दे दो
आधी रोटी
प्यार की दे दो
भूख मेरी मिट जायेगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
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डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
25-09-2010
भूख,प्यार,जीवन,भाईचारा 

सर्द चेहरा कुछ कह रहा है,खामोश निगाहों से पता पड़ रहा है


सर्द चेहरा कुछ कह रहा है,
खामोश निगाहों से
पता पड़ रहा है
बिना रंग-ओ-महक का फूल,
सच ज़ाहिर कर रहा है
उन्हें दिल-ए-बीमार बता रहा है,
लाख छुपायें, अंदाज़
हकीकत बयां कर रहा है
खामोशी में भी चहकते थे,
खामोश निगाहों से भी
कहते थे,
सोते जागते निरंतर
खिले फूल से महकते थे
क्यूं ये कहर बरपा खुदा का?
ये कौन सा इन्साफ खुदा का ?
क्यों गुलाबी चेहरा ज़र्द हो गया ,
जान-ऐ-महफ़िल, बुत हो गया
निरंतर दुआ खुदा से है,
अब उन्हें माफ़ कर दे
सर्द चेहरे को सुर्खी दे दे,
नूर उसका वापस दे दे
उन्हें मोहब्बत से नवाज़ दे
मता,ए-दिल-ओ-जाँ दे दे
उन्हें उनका हम सफ़र दे दे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर      
25-09-2010
मता-ए-दिल-ओ-जाँ=दिल और जान की पूँजी
ज़र्द =Pale,yellow,पीला

मेरा उनसे एक खामोश रिश्ता है, दो जिस्म एक जान का रिश्ता है


मेरा उनसे 
एक खामोश रिश्ता है
दो जिस्म 
एक जान का रिश्ता है
रातों को उनका पैगाम 
ख्यालों में आता है
रो रो कर हाल-ऐ-दिल 
सुनाता है 
गम-ऐ- जुदाई में भी 
ज़िंदा हैं
उड़ने को बेताब  
इक परेशाँ परिंदा हैं
जिस गुलिस्तान में 
महक रहे हैं
मजबूरी से 
जिस में जी  रहे हैं
खिजा उस में 
लाना नहीं चाहते,
अस्बाब उसका 
बनना नहीं चाहते
जो खुद को मिला 
किसी और को
देना नहीं चाहते
गम-ऐ-बेवफाई में  
किसी और को बीमार 
बनाना नहीं चाहते
जिस्म से दूर 
मगर दिल के पास हैं
निरंतर यही 
अहसास कराते हैं
जो न मिलें ज़मी पर,
खामोशी से सह लेंगे
ख्वाब जन्नत में 
पूरे कर लेंगे
रिश्ता-ऐ-खामोश को
ताब-ए-ख़ुश में 
बदल देंगे
25-09-2010
ताब-ए-ख़ुश= खुशनुमा माहौल
अस्बाब= कारण, वजह, साधन
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 


हर कोई साथ होगा,जो नहीं होगा, वो अकेला रहेगा


दुःख
दूसरों के पी लो,
अब जिन्दगी जी लो
अपने लिए करते हैं सब ,
औरों के लिए करोगे कब
माँ बाप एक नहीं तो क्या?,
जाती धर्म एक नहीं तो क्या ?
भाषा देश एक नहीं तो क्या?
खून उनका भी लाल ,
जीवन का उतना ही काल 
वो भी वैसे ही जन्मे
जैसे तुम जन्मे 
वैसे ही जायेंगे
जैसे तुम जाओगे
फिर क्यों फर्क करते हो ?
निरंतर अपनों को चाहते हो
रंग,धर्म ,देश,भाषा की
चारदीवारी को तोड़ो
नफरत से जीना छोडो,
अपने दिलों को खोल दो
खुद पहल करो ,
औरों को प्रेरित करो
अकेले का सफ़र,
काफिले में बदलेगा ,
हर कोई साथ होगा,
जो नहीं होगा,
वो अकेला रहेगा
25-09-2010

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

आज नहीं तो कल स्थिति बदलेगी

नेता देश से बड़ा नहीं होता,
अहम् व्यक्ती से बड़ा नहीं होता,
प्रशासन जनता से बड़ा नहीं होता

क्यों नेता देश से ज्यादा अपने को मानते हैं?
क्यों व्यक्ति खुद के अहम् को मानता हैं?

क्यों प्रशासन जनता से ज्यादा खुद को मानता है?
क्यों पैसा ईमान से बड़ा हो गया है?

हम कहाँ जा रहे हैं?
आने वाली पीढी को कहाँ ले जा रहे हैं?

निरंतर ये सवाल व्याकुल करते हैं
परम्परा और संस्कारों की बात करते हैं

राम,कृष्ण बुद्ध और महावीर की
धरती पर ये क्यों हो रहा है

मुझे इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा है

पर एक बात जानता हूँ
लाखों भारतीय हैं,जिनको इश्वर में आस्था है
वो भी वही सोचते हैं,जो में सोचता हूँ

निरंतर देश के संस्कारों को जीवन में,
ढालने के प्रयत्न में लगे हैं,

आज नहीं तो कल स्थिति बदलेगी
हर भारतीय की फितरत बदलेगी

24-09-2010

आलोचना को,खुले दिल से स्वीकार करो

हंसमुख जी परेशान थे,शुरू वे करते थे ,
वे पीछे रह जाते थे,जो उनसे सीखते थे
वो आगे हो जाते थे

बहुत दुखी थे,सोच उनका होता था,
काम दूसरे के आता था,

एक दिन उन्हें कर्ममुख जी मिले,
दिल का दर्द उन्हें सुनाया ,

बोले लोग बहुत खराब हैं,
मेहनत उनकी,लाभ दूसरे लेते हैं

तुम बताओ क्या करूँ ?
कर्ममुख जी बोले,कर्म करते रहो,

कैसा कर रहे हो,लोगों से पूंछते रहो
ये ना सोचो,जो कर रहे हो,सबसे अच्छा कर रहे हो

अच्छा-बुरा लोग बताएँगे,जो बुरा बताये,ध्यान से सुनो
मंथन करो,सुधार की कोशिश करो

अच्छा बताये उसको सुनो,ध्यान ना दो
तारीफ़ सुनना अच्छा लगता है ,

आलोचना सुनना भी जरूरी है,आगे बढना है तो
आलोचना को, खुले दिल से स्वीकार करो

निरंतर सुधार का प्रयत्न करो,आँख,कान खुले रखो
निरंतर आगे रहना है , तो दूसरों से ज्यादा करो

मन में विश्वाश रखो,मेहनत और जज्बे से काम करो
हंसमुख जी,नाम के अनुरूप काम करो
हंसमुख ही रहो,दुखमुख मत रहो

24-09-2010

हास्य कविता-किस्से तो किस्से होते हैं,सच्चे नहीं होते हैं

हंसमुख जी ने तोता मैना के किस्से सुने थे
इनसे बहुत प्रभावित थे,उनके लिए प्रेरणा स्त्रोत थे

वे तोता थे,मैना ढूंढ रहे थे,
उम्र हो गयी,मैना दूर थी

पर तन्मयता से लगे हुए थे
मैना के चक्कर में,खुद को भूल गए थे

हर फॉर्मुला आजमां रहे थे
बाल काले करने लगे,नियमित सैलून जाने लगे

कोलेज के रास्ते में खड़े हो,
फिल्मों के नए गाने गुनगुना लगे

मैना नहीं मिलनी थी,सो नहीं मिली,
एक दिन आशा की किरण नज़र आयी

एक मोहतरमा ने नज़र मिलाई,
इशारे से उनको बुलाया

कागज़ पर घर का पता दिया,
आने का निमंत्रण दिया

ख़ुशी का ठिकाना न था,
बन ठन कर तय वक़्त से पहले ही चल पड़े,
कपड़ों पर इत्र,हाथ में गुलदस्ता था

मिलने की जल्दी थी,
वक़्त से घंटा भर पहले ही पहुँच गए

घंटी बजायी,
अम्मा की उम्र की मोहतरमा बाहर आयी

बोली अरे तुम आ गए!,
मोहतरमा की बात सुन,उनके होश उड़ गए,

शक्ल सूरत देख,मोहब्बत के महल ढह गए,
उलटे पैर भागे,मैना को भूल गए

घर पहुँच कसम खाई,
अब कभी किस्सों के चक्कर में नहीं पड़ेंगे

किस्से तो किस्से होते हैं,सच्चे नहीं होते हैं,

क्यों मैना के चक्कर में उम्र गवाईं,
निरंतर झूंठी आस में,जीवन भर हंसी उडवाई

हकीकत को जानना चाहिए था,
अपनी अक्ल और शक्ल को,पहचानना चाहिए था

किस्से झूंठे होते हैं,ये प्रचार करते हैं
मैना का नाम अगर भूले से भी कोई ले ले,
तो गालियों की बौछार करते हैं

24-09-2010
(हंसमुख जी से क्षमा याचना सहित)

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

हास्य कविता-हंसमुख जी खुश थे,बेटे को सरकारी नौकरी मिल गयी


हंसमुख जी खुश थे,
बेटे को सरकारी नौकरी मिल गयी
जीवन की  तमन्ना पूरी हो गयी,
उनकी जिन्दगी भी सरकारी सेवा में कटी
बड़े आराम की नौकरी है 
तनखा  ज्यादा काम कम होता ,
आना जाना अक्सर अपने हाथ होता
बीमारी में इलाज मुफ्त होता ,
हर पांच दिन बाद 
छुट्टी का दिन शनिवार इतवार आता
हर त्यौहार पर अवकाश होता 
एल टी से में मुफ्त में  घूमना होता
कहीं,कहीं सरकारी मकान भी मिलता  ,
महंगाई के साथ डी ऐ बढ़ता 
कभी कभी हड़ताल में भी आराम मिलता ,
रिटायर होने पर पेंशन का प्रावधान होता
वक़्त से पहले मरने पर औलाद को,
नौकरी का अवसर मिलता
सुविधा शुल्क भी भरपूर मिलता
इतनी सुविधा और सम्मान कहाँ मिलेगा,
निरंतर सरकारी नौकरी मिले,
इस से बढ़िया भाग्य कहाँ मिलेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
23-09-2010

नीम भारत की धरोहर,पृथ्वी की शान है

नीम के पेड़ ने सदियों से अभिभूत किया है
उसके गुणों को जान,पृथ्वी सपूत मानता हूँ

छाया,आभा देताहै,औषधीय गुणों से भरपूर
कईं औषधियां देता है,

मानव दाँतों की सफाई से लेकर,नीम खली से
धरती को उपजाऊ बनाता

जिस धरती में खडा है,मानों उस का ऋण चुकाता
सबसे ज्यादा ओक्सिजन दे,पर्यावरण को शुद्ध रखता

ग्रीष्म में कोपलें फूटते ,फूल खिलते ही
पक्षीयों को खुली बाँहों से आमंत्रित करता

निमंत्रण नए नीड़ बनाने की देता है,
निम्बोलियों का आगमन,पक्षियों को
भर पेट भोजन देता है

निमंत्रण सहर्ष स्वीकार कर,
पक्षी चहचाहट से अभिवादन करते

नीम को देख ऐसा आभास होता है
मानों राजा संतुष्ट प्रजा को देख
संतुष्ट रहो का नारा दे रहा है

नीम भारत की धरोहर,पृथ्वी की शान है
निरंतर देने में लगा है,उसकी रक्षा हमारा काम है

23-09-2010

उसकी होली दीपावली मने ना मने

उसकी होली दीपावली मने ना मने
=======================
व्यापारी को धंधे की
बेरोजगार को नौकरी की

प्रेमी को प्रेमिका की
शेयर दलाल को सेंसेक्स की

नेता को सत्ता की
विद्यार्थी को इम्तिहान की

सब की,अपनी अपनी चिंता
सिर्फ फौजी को सरहद की चिंता

सर्दी-गर्मी पहाड़ रेगिस्तान जहां भी रहे
उसको केवल देश रक्षा की चिंता

बाढ़ तूफ़ान भूकंप,आंतकवाद की चिंता
जो काम उसे दे दें,उस काम की चिंता

घर परिवार से दूर,
निरंतर कर्तव्य  की चिंता
मात्र भूमी के लिए जान जाए,

देश की आन पर मिट जाए
इस बात की चिंता नहीं करता

उसकी होली दीपावली मने ना मने
खुशियाँ मिले ना मिले

उसका देश आजाद रहे
उसे बस इस बात के चिंता

हर फौजी को नमन करता हूँ
हृदय से शीश  नवाता हूँ
23-09-2010
देश,फ़ौज़,फौजी,सैनिक 

खुद की बनाई दुनिया को सुकून दे दे

आखों के आंसू दिखते हैं,
मन के मन में रहते हैं

चेहरे की उदासी झलकती है,
दिल की उदासी तोडती है

जुबान के लफ्ज सुनायी देते हैं
दिल के खामोश होते हैं

दिल की आवाज़
समझने वाले ही समझते हैं

दिल की आवाज़ समझ जाएँ
फिज़ा सारी बदल जाए

जहन में क्या चल रहा है
गर जो पता चल जाए
झंझट सारे ख़त्म हो जाएँ

निरंतर दिल में कुछ,जुबाँ पर कुछ
चेहरे पर कुछ,जहन में कुछ

वहशीपन का नमूना है,
इंसानियत से दूर,एक शैतानी नमूना है

दुआ है खुदा से सबको
एक जैसा दिल,एक जैसा जहन दे दे
खुद की बनाई दुनिया को सुकून दे दे

23-09-2010

बुधवार, 22 सितंबर 2010

अब पछता रहा था,सिर्फ खुदा याद आ रहा था

कश्ती सैलाब में
डगमगा रही थी,
बचने की सूरत
नज़र नहीं आ रही थी
मौसम खराब था,
तूफ़ान पूरे शबाब पर था,
खुदा का नाम लबों पर,
दिल में डर था
गुजरे लम्हें आँखों में
आ रहे थे,
अपने पराये सब
नज़र आ रहे थे
क्या छोड़ जाऊंगा?
क्या साथ ले जाऊंगा ?
जहन में सवाल
उमड़ घुमड़ रहे थे,
जान की कीमत
कभी समझी न थी,
खुदा की जरूरत
कभी जानी न थी
ज़िंदगी भर उलझा रहा,
काम,पैसा,कुनबा ही
दिखता रहा
अब पछता रहा था,
सिर्फ खुदा याद
आ रहा था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
खुद.भक्ति,ज़िंदगी,माया मोह

22-09-2010     

जलाने की चाहत है,तो अधर्म को जलाओ

आग माहौल को
गर्म करती है
हर चीज़ को जला कर
राख करती है
लगे जो जज्बे में
नयी राह दिखाती है
जले जहन में
तो बर्बाद करती है
लगे जो दिल में तो
मोहब्बत का आगाज़
करती है
चूल्हे की आग
पेट की आग बुझाती है
आग में
प्यार की रोशनी भी है,
आग में ख़ाक करने की
नफरत भी है  
बुराई आग में नहीं,
जलाने वाले में होती है
किस मकसद से लगाई,
उस मकसद में होती है
लगानी है आग तो
प्यार की लगाओ
निरंतर भाईचारे की
रोशनी फैलाओ
नफरत की आग को,
फौरन बुझाओ
जलाने की चाहत है
तो अधर्म को जलाओ
22-09-2010
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी.जीवन,नफरत,मोहब्बत ,आग,

सत्य उसे कचोटता है

मेरे परिचित बोले,
तुम कविता लिखते हो,
अच्छा करते हो,
अपने भाव व्यक्त करते हो
सुना हैं
तुम अच्छा लिखते हो,
मैं बोला अच्छा बुरा तो
पता नहीं पर
जो छिपा हुआ है
वो भी लिखता हूँ
सिर्फ अच्छा लिखता,
तो सब को पसंद आता
छुपा हुआ सत्य,
किसी को नहीं भाता
हर व्यक्ति
अपने आप से जोड़ता है,
अपने बारे में सत्य सुनना,
अच्छा नहीं लगता है
दूसरों का सत्य जानना,
अच्छा लगता है
उन की कमियाँ जानना,
अपनी छुपाना चाहता है
निरंतर असत्य में जीता है,
सत्य से दूर जाता है
पर उसका मन जानता है,
सत्य उसे कचोटता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सत्य
,जीवन.कचोटना

22-09-2010

हम कॉमन वेल्थ खेल करा रहे हैं


हम कॉमन  वेल्थ खेल करा रहे हैं

अन कॉमन तरीके से,,कॉमन खेल करा रहे हैं

दासता की यादों को ताज़ा करा रहे हैं

खेल बाद में होंगे,हम पहले से खेल रहे हैं
पैसे से सब जेब भर रहे हैं

आयोजक सरकार से,
सरकार जनता से,

मीडिया देखने वालों से,
सब आपस में खेल रहे हैं

खिलाडियों से ज्यादा,
अधिकारी खेल रहे हैं

महंगाई बढ़ रही है,
बाढ़ आ रही है

दुश्मन की नज़रें,
देश की तरफ बढ़  रही है

हमको क्या? हम आयोजन में व्यस्त हैं
जनता चाहे त्रस्त है, हम तो मस्त हैं,

जनता की जान जाये तो जाये
हमें तो देश की शान बढानी है
दुनिया को तरक्की जो बतानी है

जनता को आदत है,
पहले  सहा है फिर सह लेगी
निरंतर भूली है फिर भूलेगी

देश की इज्ज़त के नाम पर,
पैसे की बर्बादी चलती रहेगी

भूखी जनता भूखी ही रहेगी
हमेशा की तरह सोती रहेगी

22-09-2010

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

कर्म ही जीवन है (काव्यात्मक लघु कथा)

कर्म ही जीवन है (काव्यात्मक लघु कथा)
===========================
कचरे के ढेर में
थैलियाँ बीन रहे बच्चे से
जिज्ञासावश  पूछ लिया
क्या कर रहे हो ?
बच्चा  बोला
थैलियाँ बीन रहा हूँ ,
बेचूंगा कुछ पैसे मिलेंगे
उनसे पेट भरूंगा
मैंने कहा,कुछ और
क्यों नहीं करते हो?
जवाब आया,
पैसे के लिये लोग चोरी करते हैं,
डाका डालते हैं
कई अपराध करते हैं
एक दूसरे को धोखा देते हैं,
जान तक ले लेते हैं
कम से कम मेहनत से
काम तो करता हूँ
न किसी का लेता हूँ,
न किसी से लेता हूँ
कभी कहीं सुना था,
कर्म करो,
कर्म ही जीवन है,
कर्म ही सत्य है
बस इतना ही जानता हूँ
जो भी करता हूँ,
दिल से करता हूँ
इमानदारी से करता हूँ,
केवल भगवान से डरता हूँ
उसकी बात सुन कर
मैं निरुत्तर हो गया
आत्म मंथन करने लगा
खुद के अंदर
सच्चाई  ढूंढने लगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
21-09-2010

जो हृदय से सुनाता है,केवल उसका सुनायी देता है


वे इश्वर से प्रार्थना कर रहे थे
आज,कल से बेहतर हो,ये मांग रहे थे

जो कल तक नहीं मिला,आज मिल जाये
ऐसा चाह रहे थे

प्रार्थना में भी ख्याल पीछा,
नहीं छोड़ रहे थे

किस से लेना है,किस को देना है
कब लेना है,कब देना है

यह सोच रहे थे,
मन ही मन हिसाब भी कर रहे थे

तभी आकाशवाणी हुयी,
वत्स मैं देख रहा हूँ

निरंतर तुम मुझे याद करते हो,
पर क्या कहते हो,बता न पाते हो

मुझ से ज्यादा अपने से बात करते हो
अगर मुझे सुनाना  चाहते हो तो

खुद को भूल जाओ,मुझ में रम जाओ 
मांगो मत केवल  ध्यान लगाओ

मुझे सब दिखता है,जो हृदय से सुनाता है
केवल उसका सुनायी देता है

21-09-2010

कभी खुदा से भी पूँछ लो उसे क्या चाहिए

कभी खुदा से भी पूँछ लो उसे क्या  चाहिए

सब मंदिर,मस्जिद, 
चर्च गुरूद्वारे जाते हैं
अपने अपने खुदा से
दुआ करने जाते हैं
मांगो की फेहरिश्त 
ले कर  जाते हैं
किसी को चाहिए सुकून,
किसी को पैसा 
किसी को नौकरी,
किसी को मोहब्बत में
कामयाबी चाहिए
कुछ ऐसे भी हैं,
जिनको सिर्फ खुदा की
नज़दीकी चाहिए
सबकी चाहतें हैं,
सब को
कुछ न कुछ चाहिए
कभी खुदा से भी पूँछ लो,
उसे क्या  चाहिए
ज़मीन पर
खुदा अलग अलग
आसमान में  एक है 
उसे निरंतर,इंसानों में 
प्यार चाहिए
सब का नज़रिया एक है,
इस पर रजामंदी चाहिए
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,  

21-09-2010

बंद आखों में जीवन कटे,तैरूं भी साथ, डूबूं भी साथ

जबसे से तुम्हें देखा है,सोते जागते,

उठते बैठते,सिर्फ तुम्हें ही देखा है
जहन में छाये हो,दिल में रचे हो,
रोम रोम में तुम ही बसे हो
सूरत ने  मोह लिया है,हर ओर से जकड लिया है 
सपने में रोज़ आते हो,नया अहसास दे जाते हो
आखें मुंदने लगी,नींद आने लगी,
नींद में  सपना देखा,बगल में तुमको देखा
आकाश में उड़ रहे थे ,चाँद तारों को छू रहे थे
 दुनिया से बेखबर,एक दूजे में डूबे थे ,
वक़्त गुजर गया,उठने का वक़्त हुआ,सपना भी टूट गया 
आँख खुली तो अकेला था,सदमा बहुत गहरा था
सब दिलो दिमाग में था,निरंतर उम्मीद से सोता था,

 न नींद टूटे,न साथ छूटे,जैसे धूप छाँव का साथ ,
बंद आखों में जीवन कटे,तैरूं भी साथ,डूबूं भी साथ,
जियूं भी साथ,मरूं भी साथ


21-09-2010

सोमवार, 20 सितंबर 2010

अँधेरे कमरों में रहते हैं


अँधेरे कमरों में रहते हैं,
अँधेरे को सब कुछ समझते हैं

रोशनी को घुसपैठ समझते हैं,
दिमाग अन्धकार से भरे हुए हैं

अन्धेरा फैलाने को
धर्म समझते हैं
अपनों को दुश्मन,
दुश्मनों को दोस्त समझते हैं

समझते हैं,
कौम की बेहतरी कर रहे हैं
हकीकत में कौम को
नष्ट कर रहे है

छुप कर रहते हैं,
छुप कर वार करते हैं
उजाले से डरते हैं

जिस राह पर चल रहे हैं
भविष्य अपना बिगाड़ रहे हैं

निरंतर अपनों को मार,
खुद बर्बाद हो रहे हैं,
कहर खुदा का ले रहे हैं

हर बात का जवाब देना होगा,
यहाँ नहीं तो,ऊपर तो देना होगा

20-09-2010

हम आगे जा रहे हैं या पीछे,समझ नहीं पा रहे हैं

अखबार पढ़ रहा थ,रोचक समाचार खोज रहा था
खबर थी बेटे ने बाप को मारा,आधे पेज में वर्णन था

बाप शहीद हो गया ,बेटा मीडिया में हीरो हो गया
सुबह  से  रात  तक, टी वी  पर  छा  गया

बाप -बेटे के रिश्तों पर,नयी बहस छिड़ गयी,
टी वी पर चर्चा में भाग लेने वाले विद्वानों की
संख्या बढ़ती  गयी  ,

चैनल की टी-आर-पी  बढ़ गयी
अनेका बाप डर गए, बेटे  शेर हो गए

अपराध से प्रेरणा लेने वालों का,जोश बढ़ गया
मीडिया में छाने का,नया तरीका  हाथ लग गया

मीडिया में उसे बढ़ चढ़ कर दिखा रहे हैं
चैनल निरंतर होड़ में, नए फुटएज दिखा रहे हैं

इस से व्यथित मैं सोचने लगा,हम कहाँ जा रहे हैं
अपराध को रोकने की जगह उसे बढ़ा रहे हैं

सत्य दिखाने के नाम पर,कुकृत्य दिखा रहे हैं
हम आगे जा रहे हैं या पीछे,समझ नहीं पा रहे हैं

20-09-2010

रविवार, 19 सितंबर 2010

वो अकेले नहीं हैं,ये अहसास देता हूँ

मेरा मित्र गुम सुम रहता था,
शायद  ही कभी हंसता था, 
रोज़ नया दुखड़ा सुनाता था

मैं एक दिन बोला उस से,
अरे बावले कभी तो हंस ले

जिन्दगी भर क्या रोता रहेगा,
बर्बाद उसे  करता रहेगा

वो बोला हंसता तो मैं भी हूँ,
पर दिखाता नहीं हूँ

अपने लिए तो सब हँसते हैं,
जो हंस नहीं सकते,उनके दुःख में रोता हूँ

दुखड़े मेरे नहीं,मित्रों के होते हैं ,

जो झूंठ ही हँसते हैं

अन्दर ही अन्दर रोते है,
मन से दुखी होते हैं

हंसना ही है तो मन से हंसो
जो दुखी है उनके लिए  हंसो

निरंतर इसी प्रयास में रहता हूँ,
दुखियों को सांत्वना देता हूँ

वो अकेले नहीं हैं,ये अहसास देता हूँ 

20-09-2010

दहशत होती है तुम्हारे इरादों से


दहशत होती है तुम्हारे इरादों से, 

मकसद को मुकाम तक पहुचाने के लिए,

इस्तेमाल किये गये तरीकों से

जिसको को तुम,मकसद कहते हो 

भरमाये गए जहन का जहरीला सच है,

दुश्मन के नापाक इरादों का अक्स है, 
 
कब इंसान मारता है,किसी इंसान को 

निरंतर जान लेने की फितरत में, 

प्यार-मोहब्बत से दूर हो गए हो, 

अब खुदा से भी दूर हो गए हो 

खुदा से रहम की भीख  मांगो, 

अब भी वक़्त है , गुनाहों की माफी मांगो ,

जो किया है अब तक,उसकी सजा मांगो 

खुदा इतना बेरहम नहीं है, 

सबको देता है,तुमको भी देगा 

ख्यालों को तुम्हारे नया सोच देगा, 

तुम्हें  एक नया  मकसद देगा, 

जिन्दगी को नयी शुरुआत देगा

20-09-2010



महकेगा वही फूल,जो खिला हुआ है


महकेगा वही फूल जो खिला हुआ है
बिन खिला फूल एक सपना अधूरा है
बुझेगा वही दिया जो जला हुआ है
बिन जला दिया मकसद अधूरा है
जब दुनिया में आये हो तो
फूल की तरह महक जाओ
लक्ष्य
के लिए कर्म में लग जाओ
दीये की तरह रोशनी फैलाओ
लम्हे आयेंगे तुम्हें डगमगायेंगे,
तुम्हारे कदम भी लड़खडायेंगे
दीये की लौ भी कम होने लगेगी,
होंसला हिम्मत जवाब देने लगेगी
दिए में सब्र का घी डालना पडेगा
नए जज्बे से फ़र्ज़ निभाना होगा
महकते रहे हो महकते रहना होगा
बढे क़दमों को पीछे नहीं हटाना होगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

20-09-2010     

वे हँसते हैं तो रोते से लगते हैं


वे हँसते हैं तो रोते से लगते हैं,
जीते जी मरे हुए  दिखते हैं

उनकी हंसी,
बिना खिड़की के मकान पर,
ऊपर से चिपकाई सी  दिखती है

गाडी, बँगला,नौकर चाकर,
और पैसा उनके  मोहताज हैं

फिर भी समझ नहीं पा रहे,
हँसते रहने का क्या राज़ है

कोशिश जितनी  करते हैं
अन्दर से उतना ही  रोते हैं

पैसे से  हंसी खरीद नहीं सकते
धन को परमात्मा समझने वाले ,
खुश रह नहीं सकते 

निरंतर पैसे से शांती  खरीदने
की चाह में, शांती और खोते है 

20-09-2010

वक़्त बहुत कम है

वक़्त बहुत कम है,
अब न रंज है न गम है
जिन्दगी बीत गयी
दर्द-ओ-नफरत में
न कभी सो सका
न कभी जाग सका,
चाहे देर से जागा हूँ
मगर अब जागा हूँ,
बचे वक़्त का
इस्तेमाल कर लूं,
अपने कर्मों का
हिसाब कर लूं
दिल में नफरत को
प्यार से भर दूं,
जिन्हें भूल गया था,
उन्हें याद कर लूं
जो खोया उसे फिर ,
पाने की कोशिश कर लूं,
वक़्त बहुत कम है,
अब न रंज है न गम है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,रंज गम,प्यार ,नफरत

19-09-2010