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शनिवार, 18 सितंबर 2010

बिना दीवारों का मकान बनाना चाहता हूँ

बिना दीवारों का
मकान बनाना चाहता हूँ,
धूप हवा से उसे
भरपूर रखना चाहता हूँ
जो जब चाहे आये,
जब चाहे जाये,
आने जाने की बंदिशें
हटाना चाहता हूँ
मकान सबका होगा,
जो चाहे,
जब तक चाहे रह सकेगा
पैदा होने से मरने तक,
इंसान बंदिशों में जीता
दिल को एक बंद
कमरा बना देता है,
ना धूप ना हवा जिस में
पसंद,नापसंद की
आग उस में बसाता है,
चाहत-नफरत में,
जिन्दगी बिताता है
मकान को खुली
किताब,बनाना चाहता हूँ
जो चाहे लिख दो
जो चाहे मिटा दो
ऐसे कागज़ से
सजाना चाहता हूँ
निरंतर घुट कर जिया हूँ ,
खुली हवा में जीना
चाहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,घुटन,ज़िंदगी,

19-09-2010

नैनों के समंदर में डूब गया हूँ



नैनों के समंदर में डूब गया हूँ,
खुद को  भूल गया हूँ

दिल जिस से बहलता है,
वो  ही  कर रहा हूँ

हाले दिल सुना नहीं सकता,
लफ्जों  में बता नहीं सकता

ख़ुशी  से  झूम  रहा हूँ,
शौक-ए-आशिकी का,
जम के मजा ले रहा हूँ

आशियाना अब मेरा,
यहीं बसाना चाहता हूँ

निरंतर इश्क में तेरे,
खो जाना चाहता हूँ

18-09-2010

हास्य कविता-सरकार गरीबों को मुफ्त में मोबाइल बाँट रही है

सरकार गरीबों को,
मुफ्त में मोबाइल बाँट रही है
नया खर्चा बाँध रही है,
महंगाई से त्रस्त,

जनता को,
नए फोर्मुले से लुभा रही है

भोली जनता में हाहाकार मच रहा है,
मोबाइल बाप रखे या बेटा,
लफडा हो रहा है

काम हो न हो,
फ़ोन पर फ़ोन होने लगे,

महंगाई से परेशान थे,
अब फ़ोन से परेशान होने लगे

एक समझदार को ख्याल आया,
नेताजी रास्ता निकालेंगे

इसलिए दिल्ली फ़ोन मिलाया,
पर जवाब न आया,

वो मायूस हो गया,
दूसरे समझदार से रहा न गया

बोला निरंतर अंधे बहरों को,
क्यूं फ़ोन कर रहें हो ?

गोदाम में अनाज सड़ रहा है,
इंसान भूखा मर रहा है

वो नहीं दिख रहा है,
भूख से बच्चा रो रहा है

उसको कोई कहाँ सुन रहा है,
तूं सोचता है

तेरे मोबाइल की घंटी सुनेंगे,
समस्याओं का निदान करेंगे

दिल्ली में सब सो रहे हैं,
क्यूं उनकी नींद खराब कर रहे हो

तुम रोते रहोगे,
नेताओं की बातों में फंसते रहोगे
18-09-2010

समझदार एकता से रहते हैं

नन्हा पंछी झुण्ड से अलग,
आकाश में स्वछन्द उड़ रहा था

उसे अपना समझ,ऊपर नीचे,
गोते लगा रहा था

अनंत को छूने की कोशिश में,
हालात से बेखबर,वो उड़ा जा रहा था

झुण्ड से दूर होने का अहसास न था,
एक बाज़ उसे दूर से देख रहा था

उसे नया शिकार नज़र आ रहा था
पंछी बेखबर था,खतरे का पता न था

बाज़ ने गोता लगाया,
पंछी को खतरे का आभास हुआ

वो झुण्ड की और बढ़ गया,
शिकार होने से बच गया,
एकता का महत्त्व समझ गया

निरंतर पंछी अकेले उड़ने की
कोशिश में जान देते हैं

समझदार एकता से रहते हैं,
नासमझ शिकार होते हैं

18-09-2010

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

इबादत करते हैं लोग, दोजख से बचने के लिए

इबादत करते हैं लोग
दोजख से बचने के लिए
हरकतें करते हैं
बन्दा-ए-दोजख की तरह
दोजख से डरते हैं
फिर भी काम वही करते हैं
सोचतें है
खुदा  देखता नहीं
भूल जाते हैं
उस से कुछ छुपता नहीं
मन ही मन जानते हैं
खुद से धोखा करते हैं
खुदा का कहर बुलाते हैं
मौत के साये में रहते हैं
ना सोते हैं, ना जागते हैं
डर डर के जीते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,दोजख,खुदा

17-09-2010

सिलसिला-ए-जख्म जारी है,किरदार बदल गए वार जारी हैं


सिलसिला-ए-जख्म जारी है
किरदार बदल गए मगर वार जारी हैं
हम में भी खुद्दारी है
ज़ख्म खाते खाते भी
रस्म-ऐ-मोहब्बत निभाते रहेंगे
जंग-ऐ-मोहब्बत लड़ते रहेंगे
वो अपना काम कर रहे हैं
पैतरे बदल कर वार करते हैं
हम भी हार नहीं मानते हैं
हर वार का जवाब मोहब्बत से देते हैं
मोहब्बत के खातिर सब सहते रहेंगे
मोहब्बत में जिये हैं, मोहब्बत में मरेंगे
एक दिन उन्हें हरा देंगे
नफरत छोड़ने पर  मज़बूर कर देंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नफरत,मोहब्बत,शायरी,ज़िंदगी

17-09-2010

क्यों इंसान द्वंद्वों में फंसता है

क्यों इंसान द्वंद्वों में फंसता है
===================
बगीचे में बरगद का
नन्हा सा वृक्ष जन्मा ,
किसी पक्षी की बीट के
साथ निकले हुए
बीज की संतान था
सब कहने लगे घर में बरगद
अच्छा नहीं रहेगा
बड़ा हो कर घनी छाया से
अँधेरा कर देगा
पतझड़ में,
पत्तों से घर भर देगा
मैंने उसे घर के
बाहर लगा दिया
समय के अंतराल में
वो बड़ा हुआ
टहनियों की संख्या बढ़ी
कद काठी बढ़ी
पक्षी बैठने लगे,
नए नीड़ बन ने लगे
बरगद पूरे योवन पर था,
चैत में नए पत्ते फूटे,
फूल खिले,
जेठ में लाल फल आने लगे,
पक्षियों के पेट भरने लगे
सावन में देखा,ब
गीचे में उसी जगह
फिर एक बीज प्रस्फुटित हुआ,
नए बरगद का जन्म हुआ
सवाल फिर वही खडा हुआ,
पेड़ बड़ा होगा,
घर को नुकसान होगा,
पतझड़ में पत्तों से भर देगा
इस बार उसको,जड़ से
उखाड़ दिया
निरंतर प्रकृति की
नयी रचनायें बनती हैं,
कुछ जाती हैं,कुछ रहती हैं
कौन रहेगा कौन बचेगा?
कब तक रहेगा,
कब तक बचेगा?
प्रश्न का उत्तर न मिला है,
न मिलेगा
फिर क्यों इंसान
द्वंद्वों में फंसता है
स्वयं जीवन को
क्लिष्ट बनाता है
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर

17-09-2010

हास्य कविता-दादा ८० के, पिता ५० के, और पोता २० का

हलकी हलकी ठण्ड थी
पिता छींक रहे थे,नाक सुड़क रहे

दादा कोने में बैठे अखबार पढ़ रहे थे
नज़रें उठाई,डांट लगाईं और बोले

स्वास्थ्य का ध्यान रखो,
इतनी उम्र हो गयी,समझते नहीं हो
गर्म कपड़े पहना करो,रोज़ आंवला खाया करो

मैंने सर झुकाया,अन्दर चला गया,
गर्म कपडे पहन,आंवला खा कर,बाहर आया,
सामने बेटे को खडा पाया

वो भी जुखाम में,नाक सुड़क रहा था
मैंने उसे भी वही कहा,जो मेरे पिता ने कहा

स्वास्थ्य का ध्यान रखो,
गर्म कपड़े पहना करो,रोज़ आंवला खाया करो

पुत्र बोला,मुझको सब पता है
क्या खाना क्या पहनना,सब जानता हूँ

रोज़ नसीहत मत दिया करो
पैसे चाहिए,केवल उसकी बात करो

निरंतर यही होता था,
इधर बाप,उधर बेटा धमकाता था
५० की उम्र के लोगो का यही हाल है
ऊपर भी हिटलर नीचे भी हिटलर है

(सारे पिता और पुत्रों को, बिना किसी दुर्भाव के क्षमा याचना सहित, समर्पित. पिता और पुत्र दिल से नहीं लगायें . इस हास्य रचना का वास्तविकता से सम्बन्ध है या नहीं, इस का निर्णय मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ )

कब इंसान में इंसान बसेगा ,कब इंसान इंसान बनेगा

वक़्त के खेल का नज़ारा तो देखो,
ऊपर वाले की इच्छा का,हिसाब तो देखो

ये कैसा वक़्त आया है?

प्यार में नफरत का नाम आया है,
विश्वास में विश्वाश्घात आया है

मनों में दरार का सैलाब आया है,
दिलों में में नफरत का तूफ़ान आया है

खुदा तुझ से मुखातिब हूँ
या जवाब दे दे,या हालात को बदल दे

इंसान को इंसान बना दे,
नफरत को प्यार से भर दे

मुलाक़ात जब भी होगी,बात दो टूक होगी,
इंसान में इस बदलाव का,राज बता दे

निरंतर इबादत करता हूँ,
इस इंतज़ार में ज़िंदा हूँ

कब तेरा दिल पसीजेगा,
कब इंसान में इंसान बसेगा,
कब इंसान,इंसान बनेगा

17-09-2010

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

खिड़की खुलने का,इंतज़ार करता हूँ

खिड़की से बाहर झांको
देख कर चले जाऊंगा

लौट के फिर आऊँगा
आवाज़ भी लगाऊंगा

चाहा है तुम्हें चैन कहाँ पाऊंगा
इन्तिज़ार किया है,करता रहूँगा

जो जिम्मा लिया है दिल ने,
पूरा निभाऊंगा

गर थक गए कदम मेरे
तेरे कूंचे के बाहर ही,घर बसाऊंगा

कभी तो खिड़की खुलेगी,
तुम बाहर झांकोगी

मुझे देखोगी,पसीजोगी,मुस्कराओगी
इशारे से ऊपर बुलाओगी

सर झुका कर हाँ भरोगी,
प्यार मेरा कबूल करोगी

इस लिए रोज़ आता हूँ
खिड़की खुलने का,इंतज़ार करता हूँ

17-09-2010

नफरत भरे दिलों को,प्यार से धोने में लगा हूँ


लोग
क्यूं राहों में कांटे बोते है,
खुद से ज्यादा 
दूसरों पर ध्यान देते हैं 
पीठ पीछे नश्तर चुभोते हैं,
न खुद चैन से सोते हैं
न सोने देते हैं 
ये शौक है
या नफरत उनकी 
हमें तो न बता पायेंगे 
जो जानना चाहे 
वो पूछ ले उनसे 
क्या है उनकी
फितरत का राज़? 
आग से भरे हुए,नफरत से 
लबालब दिल का राज़
इंसानियत से 
दुश्मनी की चाह,
कहाँ से पायी है उन्होंने
क्या सहा उन्होंने,
जो सहा नहीं हमने 
वो हकीकत से अनजान हैं,
इंसानियत से दूर
 करीब-ए-शैतान है 
खुदा से दुआ है,
उनकी आँख खोले 
नफरत को छोडें
इंसानियत से जोडें
निरंतर 
इसी कोशिश में लगा हूँ 
नफरत भरे दिलों को,
प्यार से धोने में लगा हूँ 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 


17-09-2010

रोज़ चुप चाप खड़े खड़े, वो यही सोचते थे

वो चुप चाप खड़े थे,
अपनी व्यथा किसे सुनाएं,
ये सोच रहे थे,

क्या कोई सत्य का साथ देगा,
क्या बात मेरी समझेगा

मुझ को अपना समर्थन देगा,
मेरे समर में मेरा साथ देगा

पहले भी सहारा लिया था मैंने,
हर बार धोखा खाया था मैंने

क्या इस बार भी वही हाल होगा,
विश्वाश में विश्वाशघात होगा

इसी भय से निरंतर सहम गया हूँ ,
लगता है अकेला पड़ गया हूँ

क्या कोई भी ऐसा नहीं है ,
यकीन जिस पर कर सकूं

निरंतर विश्वाश का क़त्ल हो रहा है,
ये सब खुले आम हो रहा है

स्वार्थ के खातिर इंसान,
इंसान को मार रहा है

रोज़ चुप चाप खड़े खड़े,
वो यही सोचते थे

16-09-2010

जैसा बोओगे,वैसा ही काटना होगा

हंसमुख जी अच्छे कवी हैं,अच्छा लिखते हैं,
ऐसा सब कहते हैं

वर्षों बाद उन्हें पुराना मित्र मिला
वो भी कविता लिखता है,ऐसा पता चला 

मित्र ने एक कविता सुनाई,उन्हें समझ नहीं आयी

मित्र को बुरा न लगे, इसलिए तारीफ़ कर दी
तारीफ़ महंगी पडी, आफत बन,सर पर चढी

रोज़ मित्र का आना,नयी कविता सुनाना
दिनचर्या में शामिल हो गया,
हंसमुख जी की परेशानी का, कारण बन गया

एक दिन मित्र से बोले, क्यूं वक़्त बर्बाद करते हो?
क्यूं  बेतुकी कवितायें सुनाते हो?

मित्र बोला,तुम्हारी वर्षों पहले,
छपी हुयी किताब से,चुरा कर सुनाता हूँ

वर्षों से तुम्हारी कविताओं ने,निरंतर लाखों को सताया है

मुझे ख़ुशी है,तुमने सत्य को जान लिया,
तुम्हें उतना ही मजा आया,जितना लाखों को आया है

मेरी बात का बुरा मत मानना,अगर सुनना चाहते हो
तुम्हें भी सुनना होगा,कुछ तुम्हें भी बर्दाश्त करना होगा 
जैसा बोओगे ,वैसा ही काटना होगा


16-09-2010 
(हंसमुख जी से माफ़ी चाहते हुए)

पड़ोस में अन्धेरा है, तुम चिराग जला रहे हो

पड़ोस में अन्धेरा है,
तुम चिराग जला रहे हो
वहां मौत का गम,
तुम जन्म दिन की
 ख़ुशी में,
जश्न मना रहे हो
वहाँ खाने को रोटी नहीं,
तुम दावत उड़ा रहे हो
जो आज वहाँ हो रहा है,
कल तुम्हारे
यहाँ भी हो सकता है
वहाँ रौशनी होगी,
तुम्हारे घर में
अन्धेरा छाया होगा
क्या ये बर्दाश्त होगा ?
क्या जीवन
ऐसे ही चलेगा?
कोई हँसेगा
कोई रोयेगा
क्यों न गम ख़ुशी बाँट लें,
कंधे से कंधा मिला
साथ जीना सीख लें
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
,ख़ुशी,ज़िंदगी,भाईचारा,


16-09-2010

नियम परमात्मा का, मानना भी जरूरी है

टहनी बोली बूटे से,
मेरे लिए भी कुछ कर दो,

सब देखें मुझको,
इसलिए फूलों से भर दो

बूटा बोला टहनी से,
पहले कलियाँ लगेंगी,

फिर फूल खिलेंगे,
सब तुझको देखेंगे

पर ध्यान रख,
फूल मुरझाएंगे,

नीचे गिर जायेंगे,
नज़रें भी हट जायेंगी

तब बहुत दर्द होगा
पाने से ज्यादा,
खोने में दर्द होता है

जो मिला है तुझको निरंतर,
उस से संतुष्ट रह

पाने की चाहत रखते हुए,
खोने का अहसास भी रख

चाहत जितनी आवश्यक,
नियंत्रण उतना ही जरूरी है

नियम परमात्मा का,
मानना भी जरूरी है

16-09-2010

ऐसे आशिकों से आशिकों को खुदा बचाए

वो पूंछते भी नहीं हाल-ए-दिल क्या है
उनकी बेरुखी का असर क्या है

हम पछता रहे,वो मुस्करा रहे हैं
हम लडखडा रहे,वो दौड़ रहे हैं

दिलों से खेलना उनकी आदत है,
झटके से दिल तोड़ना,उनकी चाहत है

ऐसे सितम को देख कर,
आशिक इश्क से पनाह कर ले

निरंतर,देखते ही जो मुस्कराएं,
ऐसे आशिकों से खुदा बचाए

16-09-2010

वो बुलाएँ या न बुलाएँ

जाने से उनके,
रौनक -ए-बहार चली गयी,
गुलों की महक कम हो गयी

चेहरा-ए-आब ख़त्म हो गया,
दिल का सुकून चला गया

कहीं तो होंगे वो,
कोई पता उनका बता दे,
कहाँ देखा था सिर्फ इतना बता दे

कुछ वक़्त के लिए ही सही,
लौट कर वो घर मेरा सजा दें

गम- ए-दौरां को,दौरा-ए -ख़ुशी बना दें
जाने से पहले अपना पता बता दें

इस के बाद कितना भी सताएँ,
निरंतर जायेंगें पास उनके,
वो बुलाएँ या न बुलाएँ

16-09-2010

बुधवार, 15 सितंबर 2010

उनके जन्मदिन पर, मैंने उनको इक तोहफा भेजा



उनके जन्मदिन पर, 
उनको इक तोहफा भेजा 

तोहफे में अपना दिल भेजा, 
हमेशा की तरह बेनाम भेजा

जो खोला तो समझ जायेंगे, 
हमें पहचान लेंगे 

 उम्मीद है मिलने का पैगाम
 भिजवाएंगे 


ना  खोला तो,हर बार की तरह,
तरसाए जायेंगे,
अगले जन्मदिन का,
इंतज़ार करवाएंगे 

कई बार ये ख्याल आया, 
क्यूं अपना नाम ना बताया?

पर इस डर ने,निरंतर सताया, 
गर वो ना पहचानें तो 

तोहफे का खर्चा बेकार जाएगा 
हमारी तमन्नाओं पर ,
ताला लग जाएगा
15-09-2010
E

मैंने एक धड़कन,सीने में दबा रखी है

मैंने एक धड़कन,सीने में दबा रखी है
जिसके लिए धड़कती है
वो कहीं और रहती है

वो याद रोज़ आती है
मगर नज़र नहीं आती है

दिया जो दिल में छुपा रखा है,
कब आकर कोई जलाएगा,
लगी हुई आग को कब बुझाएगा

इसी उम्मीद में जी रहा हूँ,
याद में वक़्त गुजार रहा हूँ

यूँ तो कब की चली गयी,
इन्ही हाथों से दफनाई गयी

कहीं टूट न जाऊं,
उनको भूल न जाऊं

इस लिए याद करता हूँ,
निरंतर कुछ न कुछ लिखता हूँ

15-09-2010

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

जनता की बात सत्ता सुनेगी,जनता के लिए सत्ता जियेगी

आज कितना भी इस्तेमाल कर लो
झूठे वादों से मुझे लुभालो

मुझे पता चलने लगा है
कुछ समझ आने लगा है

क्यूं रही में दबी कुचली ?
क्यूं गरीबी में पली बढ़ी ?

जैसी सुबह थी,वैसी ही शाम थी
सुबह अधूरी थी शाम भी अधूरी है

अपने देश में ही बेसहारा थी
अब ये आजमाइश कम होगी
धीरे धीरे बंद होगी

वो वक़्त आयेगा
जनता जनता पर राज करेगी
नेताओं से मुक्ति मिलेगी

निरंतर इसी आशा में जी रही हूँ
कल की सुबह खुशगवार होगी

जनता की बात सत्ता सुनेगी
जनता के लिए सत्ता जियेगी

14-09-2010

सफ़र में छाँव मिल जाये कहीं

सफ़र में छाँव मिल जाये कहीं,
तपन गर्मी की कम हो तो सही

दोपहर हो गयी है,बेचैनी बढ़ रही है,
तपन बढ़ गयी है,हवा भी थम गयी है

ये सिलसिला कब रुकेगा?
गर्मी से चैन कब मिलेगा?

योवन अग्नि कब शांत होगी?
जीवन जरूरत कब पूरी होगी?

कब तक मीत का,इंतज़ार करना होगा,
जीवन सफ़र में कब,साथी का साथ होगा?

ये सवाल योवन की दहलीज पर खड़े,
हर युवा के होते हैं

जीवन सफ़र में साथी मिले,
निरंतर इसी तमन्ना में युवा जीते हैं

14-09-2010

हिंदी को नमन है

हिंदी जानता हूँ ,हिंदी बोलता हूँ
इस बात पर गर्व करता हूँ

मैं कितना धन्य हूँ
यह मैं ही जानता हूँ

हिंदी भाषाओं में रत्न है
यह एक कटु सत्य है

हिंदी की सेवा को,
देश सेवा समझता हूँ

इसी लिए हिंदी में लिखता हूँ

निरंतर इसके प्रसार मैं लगूंगा
इसके लिए प्रयत्न सारे करूंगा

यह मेरा प्रण है,हिंदी को नमन है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 


12-09-2010

(हिन्‍दी दिवस की बधाई और शुभकामनाएं !!
14-09-2010,हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में)

हास्य कविता-ओस्कर बेकार है-जो देते है-उनको धिक्कार है

ओस्कर बेकार है
जो देते है,उनको धिक्कार है

मेरे देश के सबसे बड़े अभिनेता
मेरे नेता को,अभी तक नहीं दिया

उस पुरस्कार का क्या आधार है?

जिसने,जनता को लुभाएँ कैसे?
झूठें वादों में फंसायें कैसे?
गरीब को गरीब रहने दो

जैसी असंख्य फिल्मों का
निर्माण और निर्देशन किया है

गीत,संगीत और कहानी में भी,
पूर्ण योगदान दिया है

बहु आयामी व्यक्तित्व वाले
मौके बेमौके,
निरंतर अभिनय की क्षमता वाले
नेता को हमने तो पहचाना,
तुम भी पहचान लो,

उनके अभिनय की दाद दो
जल्दी से ओस्कर प्रदान कर दो
(विशुद्ध हास्य कविता है ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )

14-09-2010

तुम किस के लिए क्या,क्यूं, और किस भाषा में लिखते हो?

मेरे मित्र ने पूछा
तुम किस के लिए क्या,क्यूं,
और किस भाषा में लिखते हो?

मैंने जवाब दिया
एक आम आदमी के लिए
जिसने वो ही देखा सहा
और भुगता है,जो मैंने

अब भी सह,भुगत और देख रहा है
सच की तलाश मैं भटक रहा है

जिन्होंने न भुगता न सहा और
दोहरेपन में जी रहे लोगों को
पहचानने के लिए लिख रहा हूँ

मैं हिन्दुस्तानी में लिखता हूँ
शब्दकोष में ढूँढना न पढ़े
उन शब्दों इस्तेमाल करता हूँ

आसानी से समझ आये
निरंतर,उस भाषा में लिखता हूँ

14-09-2010

हास्य कविता-मैं एक नेता हूँ,सबसे बड़ा अभिनेता हूँ

मैं एक नेता हूँ,
सबसे बड़ा अभिनेता हूँ
इसी लिए भोली-भाली जनता
का चहेता हूँ
मैं सिर्फ झूंठ बोलता हूँ
फिर भी बच जाता हूँ
कपडे सफ़ेद पहनता हूँ,
अन्दर क्या है,
बाहर दिखने नहीं देता हूँ
मैं देश सेवा करता हूँ
देश का माल अन्दर करता हूँ
नित नए दांव पेच ढूंढता हूँ
फिर जनता पर आजमाता हूँ
सब मुझे जानें,इस लिए
भरपूर फोटो भी खिचवाता हूँ
हाजमा ठीक रहे इस लिए
भाषण खूब देता हूँ
हर जगह नज़र आता हूँ,
मरने वाले की जगह भी,
मैं ही दिखना चाहता हूँ
भोली जनता भोली रहे
धंधा मेरा चलता रहे
निरंतर यही प्रार्थना करता हूँ
मैं एक नेता हूँ,
सबसे बड़ा अभिनेता हूँ

14-09-2010
(अच्छे नेताओं से,क्षमा याचना करता हूँ,मेरे व्यंग्य को अपने पर न लें,विशुद्ध हास्य कविता है ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं हैदिल से ना लगायें,ये प्रार्थना करता हूँ फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )

तुम्हारे बगैर मैं क्या करूँ?

सावन आये या भादों
इस मौसम का मैं क्या करूँ

जो देखे थे सपने हमने
उन सपनों का मैं क्या करूँ?

जिन ख्यालों ने रखा ज़िंदा अब तक
उन ख्यालों का मैं क्या करूँ

चले थे साथ जिस रास्ते पर
उस पर चल क्या करूँ ?

तुम बिन सब सूना है
जीवन अब अकेला है

निरंतर तुमको याद करूँ
कब तक इंतज़ार करूँ?

गुलों से महरूम
बहार का मैं क्या करूँ?

तुम्हारे बगैर मैं क्या करूँ?

14-09-2010

सोमवार, 13 सितंबर 2010

जो पाया उसकी क़द्र करो

जो पाया उसकी क़द्र करो
कैसे मिला है याद रखो

जिनसे मिला है
उनको भी तो याद करो

क़र्ज़ अपना चुकाओ
फ़र्ज़ अपना निभाओ

लेने की न सोचो
कुछ देना है ये भी याद रखो

निरंतर कुछ ऐसा कर जाओ
छाप अपनी छोड़ जाओ
याद तुम भी आओ

लेना जितना आसान है
देना उतना ही मुश्किल

मुश्किल को आसान बनाओ
निरंतर लेते जाओ
निरंतर देते जाओ

13-09-2010

लता में कहलाती हूँ

पेड़ सूखे हो या हरे हो
छोटे हो या बड़े हो

वृक्ष हो या झाडी हो
ग्रिल या सीमेंट की जाली हो

छूने भर का सहारा
मिले तो हाथ बढ़ा
खुद राह बनाती हूँ

हौले से ऊपर चढ़
सारे में छा जाती हूँ

भाँती भाँती के रूप मेरे
भाँती भाँती की सज्जा

किस्म किस्म के फूलों से
सबको लुभाती हूँ

दृढ निश्चय के साथ निरंतर
आगे बढती जाती हूँ

जूही,चमेली रूप हैं मेरे
घर आँगन महकाती हूँ

लता मैं कहलाती हूँ

13-09-2010

रविवार, 12 सितंबर 2010

अस्थिरता कब आयेगी

सोता हूँ तो नींद नहीं आती
जागने की इच्छा नहीं करती

कभी लेटता हूँ,
कभी उठ कर बैठता हूँ

विचारों का भूचाल आया है
ठन्डे पानी में उबाल आया है

जो ठहरा हुआ था
गतिमान हो गया था

जिन्दगी में बदलाव आ गया है
स्थिरता में अस्थिरता का भाव आ गया है

ऐसा नहीं है की तूफ़ान थमता नहीं
गरम पानी ठंडा होता नहीं

निरंतर जीवन की स्थिरता में
अस्थिरता कब आयेगी

सोते हुए को कब जगाएगी

कब क्या होगा?
किसी को पता नहीं



12-09-2010

वक़्त के क़दमों से कदम मिला दूँ

क्या में सोचना छोड़ दूँ ?
जिस सोच ने इस मुकाम तक पहुचाया

उस सोच को छोड़ दूँ?
उसूलों के लिए लड़ना छोड़ दूँ?

क्या में पुराना हो गया हूँ?
वक़्त से पिछड़ गया हूँ?

निरंतर वक़्त से आगे था
अब वक़्त से पीछे हो गया हूँ

वक़्त,वक़्त के साथ चले
घड़ी भी ठीक वक़्त से चले

निरंतर घड़ी में चाबी भरनी पड़ती है
सोच की घड़ी भी धीमी पड़ती है

अब समझ गया हूँ
वक़्त से क्यूँ पिछड़ गया हूँ

क्यूँ न सोच की रफ़्तार बढ़ा दूँ?
वक़्त के क़दमों से कदम मिला दूँ

12-09-2010

मेरी ज़िन्दगी में भी रोशनी होगी

मन में उदासी छाई है
दर्द काफी गहराई में है

सूरज की गर्मी में कमी आयी है
शाम आ चुकी है,रात भी करीब आयी है

सोचता था तारों से रोशनी होगी

अमावस की रात थी
रोशनी की आस भी बेकार थी

सूरज की रोशनी में दमकता था
अमावस का ध्यान न था

निरंतर सुबह होती है
सूरज की किरणों से धरती चमकती है

शायद कल की सुबह बेहतर होगी
मेरी ज़िन्दगी में भी रोशनी होगी

12-09-2010

आशिक ने आशिक को कब जाना

आशिक ने आशिक को कब पहचाना,
आशिक ने आशिक को कब जाना

अगर जाना होता,पहचाना होता,
तो आशिक-ए-जनाजा न होता

न कोई आशिकी में मरता,
न कोई आशिकी में जीता

आशिक का इंतज़ार ना होता,
न इंतज़ार में कोई आशिक रोता

आशिक को आशिक का ऐतबार होता,
तो आशिक को निगाह-ए -शक न होता,
कोई आशिक,कभी जुदा न होता

आशिकी के किस्से,सब शौक से सुनते हैं,
शायर भी चस्के ले ले के लिखते हैं

गर आशिक जिंदगी भर आशिक रहता,
दुनिया में अब तक कोई ज़िंदा न रहता

छोड़ दो आशिकी के किस्से सुनना,सुनाना,
जो करनी है आशिकी इंसान,इंसान से कर ले
निरंतर प्यार दे दे,निरंतर प्यार ले ले

कोई आशिक अब मायूस न होगा,
आशिकी में जान न देगा

हर एक को हर किसी का दर्द होगा,
जो भी होगा हमदर्द होगा

12-09-2010

मैं अपने “आज” से लड़ रहा हूँ



मैं अपने “आज” से
लड़ रहा हूँ
अपने 
अतीत से झूज रहा हूँ
उस पर लगे
अहम् और स्वार्थ के
इश्तहारों को
उखाड़ने की कोशिश
में लगा हूँ
जो मेरे आज के सूरज को
ढकने की कोशिश में
अहम् और स्वार्थ की
काली अंधेरी रात को
ढलने नहीं देते
मुझे सवेरे के
निश्छल उजाले को 
देखने नहीं देते 
मेरा आत्म विश्वाश
ही मुझे हारने नहीं देता
इश्तहारों को उखाड़ने की
हिम्मत टूटने नहीं देता
मैंने भी निश्चय कर लिया
भविष्य पर अतीत की
छाया भी पड़ने नहीं दूंगा
दिन को ढलने नहीं दूंगा
निरंतर 
सूर्य के उजाले में रहूँगा
अतीत के इश्तहारों को 
उखाड़ फैकूंगा
भविष्य के"आज"को 
बीता हुआ कल बनने 
नहीं दूंगा

12-09-2010
Edited:18-12-12 
अहम्,स्वार्थ ,आज,कल ,जीवन 

कम से कम आज तो भर पेट नाश्ता कराएगा

रोज़ की तरह वो,आज भी टहल रहे थे
इधर उधर देख रहे थे,शायद कोई पहचान ले

इशारे से घर बुला ले,भर पेट नाश्ता करा दे
इसी इच्छा में,अनिच्छा से आगे बढ़ गए

तभी उन्हें एक कुत्ता नज़र आया
पूछने पर उसने,अपने को,

उनके मोहल्ले का ही बताया
वे खुश होकर,मन ही मन मुस्कराए

तभी उनका घर आ गया
टहलने का वक़्त पूरा हुआ

वो अन्दर चले गए
रोज़ की तरह काम में,लीन हो गए

कल फिर सवेरा होगा,रोज़ की तरह निरंतर

फिर टहलने जायेंगे,इधर उधर देखेंगे

शायद आज कोई जानने वाला,मिल जाएगा
जो इशारे से बुलाएगा

कम से कम आज तो
भर पेट नाश्ता कराएगा

12-09-2010

घुँघरू की आत्मा कथा

मैं एक घुँघरू हूँ

भट्टी में ढला

कांसे के खोल में डला

चमड़े के पट्टे में बंधा

कई हाथों से गुजरा

पैरों में बंधा

एक छोटा सा घुँघरू हूँ

तबले की थाप पर

देखने वालों की वाह पर

पैरों की धमक से

जोर से बजता हूँ

आज तक किसी ने ना पूछा

मैं रोता हूँ या हंसता हूँ

भाई बंधों के बीच खुश हूँ

निरंतर बजता हूँ

जीवन ऐसे ही जीता हूँ

12-09-2010

इस बाज़ार मे सब मिलता है

इस बाज़ार मे सब मिलता है 
जो चाहो वो भी मिलता है
जो न चाहो वो भी मिलता है
दुश्मन गले लग कर मिलता है 
चाहने वाला छुप कर मिलता है
फरेब यहाँ मुफ्त में मिलता है 
अपना,पराया हो कर मिलता है 
बिना मांगे प्यार मिलता है 
मांगो तो दर्द- ए-दिल मिलता है
जो बे मोल है पैसे से मिलता है
हवा पानी उजाला जो अनमोल है 
बना दाम चुकाए ही मिलता है 
निरंतर बाज़ार में जाओ
हर चीज़ का मोल लगाओ
मिले तो हँसते रोते ले आओ
ना मिले तो वापस लौट आओ 
कल बाज़ार फिर लगेगा
नया बेचने वाला मिलेगा 
नया खरीददार भी मिलेगा 
इस बाज़ार मे सब मिलता है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,दुनिया,बाज़ार  

मेरी परेशानी से परेशान न होना

मेरी परेशानी से परेशान न होना
अपनी पेशानी पर कोई सल न लाना

मेरे गुनाहों की सजा मुझको भुगतने दे
निरंतर कोई और सज़ा मुझ को न दे

तेरे प्यार का निगेहबान बन के रहूँगा
चाहे हो जाऊं कुर्बान,हर हाल में तुझे चाहूंगा

तुम्हें खोया तो अहसास हुआ मुझको
क्या नहीं किया तुमने, पाने के लिए मुझको

में ही ना फरमान निकला
यार का ही गुनाहगार निकला

मैं सबब बना परेशानी का तेरी
मानता हूँ सब गलती थी मेरी

मेरी परेशानी से परेशान न होना

12-09-2010