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शनिवार, 11 सितंबर 2010

आज कल निरंतर लिखता हूँ

पहले महफ़िल की जान था
अब बेजान हूँ

बिन खिले भी महकता था
अब खिले को भी सूंघता नहीं कोई

कल गलत भी सच होता था,
अब सच भी मानता नहीं कोई

अपने पराये में फर्क न था
सब अपने थे,मैं सबका था

अब अपने पराये लगते हैं
शक की नज़र से देखते हैं

अपनों की नज़र लग गयी
मुस्कान मेरी चली गयी

दिखाने को मुस्कराता हूँ
खुश दिखने की कोशिश करता हूँ

अपने जज्बातों को समझाने के लिए
आज कल निरंतर लिखता हूँ

11-09-2010

लौट कर वापस आ जायेंगे

आज उनको किसी के
साथ जाते हुए देखा
हँस हँस के बातें करते हुए देखा,

हमें अनदेखा करते हुए देखा
बगीचे के फूल को
 कहीं और महकते देखा,

जिस को सीचां था,उस पेड़
की जड़ों को खोदते देखा,

बातें करते थे जान देने की
जान लेने की कोशिश करते देखा,

निरंतर क्यूं आजमा रहे हैं
मुश्किलें खुद की बढ़ा रहे हैं,

इतना आसां न होगा हमें छोड़ना
दिल-ओ-जान के रिश्ते को तोड़ना,

हमारे दर से उठ कर कहा जायेंगे
दो कदम चल के ठहर जायेंगे,

दिल की आवाज़ को सुन लेंगे
लौट कर वापस आ जायेंगे,

11-09-2010

आशिकी में

कब दिल खुश रहा किसी आशिक़ का,
आशिक़ी में

दिल बरबाद होता है हर आशिक़ का,
आशिक़ी में

चैन से सोता नहीं कोई आशिक़,
आशिक़ी में

कहीं छूट न जाये साथ आशिक़ का
आशिक़ी में

निरंतर इस डर में जीता है आशिक़
आशिक़ी में

लुटाते हैं घर आशिक़
आशिक़ी में

आशिक़ -ए- दिल को ठंडक नहीं होती
आशिक़ी में

ये सच है हर आशिक़ का
आशिक़ी में

11-09-2010

आशिके बीमार को,बीमार ही छोड़ गये

निगाहें उनकी उठी,निगाहों से मिली
यूँ लगा कोई बिजली गिरी

ग़मे-आशिक़ी में,रोशने बहार आयी
ज़मीं पे फ़स्ल-ए-गुल आयी

दिल को राहत की,तस्वीर नज़र आयी

लगा हमें हमारा मुकाम मिल गया
निरंतर कोशिशों का सबब मिल गया

इस ख्याल में हम खो गए,

जब तक होश में आये,वो चले गये
आशिके बीमार को,बीमार ही छोड़ गये

11-09-2010

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

वक़्त-ए-जनाजा तो आयेगा


कितना भी इतराओ,
लाख नज़रें फिराओ
इस  दिल के
गुलशन का गुल
बनो न बनो
ये वादा है
दिल-ए-नाकाम का
जनाजा-ए-मरहूम पर तो
बिछना होगा
आज नहीं तो क्या,
कल तो आना होगा
फिर पछताओगे,
खुद से सवाल करोगे
बुला रहे थे
जब खुली बाँहों से,
क्यूं दर्दे गम ले लिया,
क्यूं मुहं मोड़ लिया
आस में जी रहा हूँ,
तमन्नाओं के जाल में
उलझ गया हूँ
इक दिन तुम्हारा
पैगाम आयेगा,
लब पर मेरा नाम आयेगा,
दिल में मोहब्बत का
सैलाब आयेगा
जीते जी ना सही,
वक़्त-ए-जनाजा
तो आयेगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत,तमन्ना,शायरी

10-09-2010

ये किस से समझेंगे

अब हम,
क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ न रहे

कल नूर- ए-निगाह थे,
अब काबिल-ए-निगाह न रहे

फ़िराक़-ए-यार ने,
हमें,खुद से ही दूर कर दिया,
किस्मत ने कैसा मजाक कर दिया

दर्दे-जुदाई तो सह लेंगे,
दिल-ए-बेगाना को याद कर जी लेंगे

पर कैसे करेंगे ज़ख़्म-ए-जिगर को रफ़ू,
निरंतर ये किस से समझेंगे

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
1.क़ाबिल-ए-मोहब्बत-ए-जानाँ=प्रीतम के प्रेम के क़ाबिल
2.फ़िराक़-ए-यार =प्रेमी/प्रेमिका का विछोह्
10-09-2010 

अब परेशान नहीं होता हूँ

अब
परेशान नहीं होता हूँ,
चेहरे पर कोई
भाव नहीं रखता हूँ,

वक़्त के थपेड़ों ने
इतना तपाया,
वक़्त ने ही वक़्त से
लड़ना सिखाया

पहले सोया हुआ था,
अब जाग गया हूँ

नया करने का साहस ,
आगे बढने का प्रयास,
अपने में विश्वाश,

प्रभु की भक्ति,
मन की शक्ति ने
सिखाया
अब परेशान नहीं होता हूँ,
शिकायत से
परहेज रखता हूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

10-09-2010

वो दिन जरूर आयेगा

वो दिन जरूर आयेगा,
जब मरुधर में फूल खिलेंगे

दिल खुशियों से महकेंगे,
अपने,अपनों से मिलेंगे

एक दूजे को समझेंगे,
प्यार का जवाब प्यार से,
नफरत का जवाब भी
प्यार से देंगे

कौम और मजहब का
फर्क मिट जाएगा,
रंग भेद गाली कहलायेगा

जात और भाषा का
नाम लेने वाला,
काफिर जाना ज़ायेगा

धर्म और प्रान्त की
बात करने वाला,
देश का दुश्मन कहलायेगा

निरंतर इंसान को इंसान,
जानवर की जान को भी,
जान समझेगा
वो दिन जरूर आयेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

10-09-2010

अब में चुप रहता हूँ

अब चुप रहता हूँ,
चुपचाप सहता हूँ

ग़मों की बारिश ने,
 बदल दिया

पहले भीड़ से घिरा था,
अब अकेला रहता हूँ

अपनों ने समझा नहीं,
इसका कोई गिला नहीं

काटा है वो,जो बोया नहीं
हालात ने रोका,रुका नहीं

जो खो दिया,उसे रोया नहीं,
अब भी ख़ुशी से जी रहा हूँ

अतीत से सीख रहा हूँ
कुछ नया कर रहा हूँ,

सुकून की कोशिश में,
निरंतर
कुछ नया लिख रहा हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

10-09-2010

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

दर्दे दिल की दवा दे दे

आशिक़-ए-बीमार से पूछते हो
हाल-ऐ-दिल क्या है

निगाह-ऐ-यार के तीरों से छिदे
दिल का मुकाम आखिर कहाँ है,

रफीकों ने मेरा ये हाल किया है
कौन समझाए,उन्होंने क्या खोया है

दिल फ़रियाद से लबरेज़ है
कोई तो उनको ये सलाह दे दे

गर्मी-ए-मोहब्बत को ठंडक दे दे
दर्द-ऐ-दिल की दवा दे दे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

09-09-2010

आज पकड़ते हैं कल छोड़ते हैं


वे शाख-ऐ-नाज़ुक पर,
आशियाना
बनाना चाहते हैं
गुलफाम बिना दिल का
गुलिस्तां बसाना चाहते हैं
दिल दिए,बिना
दिल लेना चाहते हैं
बुझी हुई शमा से,
रोशनी चाहते हैं
शौक-ऐ-मोहब्बत में
नए प्यादे ढून्ढते हैं
आज पकड़ते हैं,
कल छोड़ते हैं
मोहब्बत का नहीं
हवस का
दस्तूर निभाते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,मोहब्बत,

09-09-2010

सारे दाव् पेच बेकार होते हैं

शहर में इश्क के किस्से आम थे
हम  इसलिए बदनाम थे

जो कारण थे ,वे गुमनाम थे
वो गुलशन,हम गुलफाम थे

चाहत की इन्तिहाँ ही थी
हम दागदार,वो बेदाग़ थे

इश्क में लोग तज़्क़िरे तो करेंगे,
फिकरे भी कसेंगे

निरंतर इश्क में,
अंजाम से डरने वाले,नाकाम होते हैं
उनके सारे दाव् पेच बेकार होते हैं

1.तज़्क़िरे=चर्चाएँ

09-09-2010

कोई बताये में क्या करूँ

दुखों के
चौराहे पर खड़ा था
पशोपश में पडा था
दुनिया से पूछता रहा
बताओ मैं क्या करूँ
रोता रहूँ या
हँसने की कोशिश करूँ
सोते से जाग जाऊं
तभी ख्याल आया
वक़्त का इम्तिहान ना लूँ
गंदले पानी को
ठहरने दूँ
वक़्त को गुजरने दूँ
गंद नीचे बैठ जाएगा,
ऊपर साफ़ पानी
रह जाएगा
बुरा वक़्त भी
गुजर जाएगा,
अच्छा वक़्त आयेगा
ऐसा वक़्त आता है,
तो वापस भी जाता है
यही सोच कर
दिनचर्या में लीन हो गया
कर्म पथ पर चलने लगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-09-2010  
जीवन,कर्म,सोच

बुधवार, 8 सितंबर 2010

दिल मचल गया

फूल को देख
भँवरे का दिल मचल गया,
नजाकत ने
मन मोहित कर दिया
चंचल  मन रोके ना रुका,
फूल को सीने से लगा लिया
फूल ने ख़ामोशी से
सर झुका दिया,
मोहब्बत के दुश्मनों को
गवारा ना हुआ
मिलने से पहले ही
शोर मचा दिया,
मिलने से पहले ही
प्रेमी जोड़ा बिछुड़ गया,
मोहब्बत की
कहानी का अंत हो गया
मोहब्बत के दुश्मनों का,
यही काम होता है,
प्रेमियों की जुदाई में
सबसे बड़ा हाथ होता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-09-20I0
मोहब्बत,शायरी 

जिंदगी की नयी किताब लिखना चाहता हूँ

जिंदगी की
नयी किताब
लिखना चाहता हूँ,

बेतरतीबी से
लिखे पन्नो को
हटाना चाहता हूँ,

उनपर बदरंग
सियाही के धब्बों को
मिटाना चाहता हूँ,

मोहब्बत के हर्फों से नयी
कहानी लिखना चाहता हूँ,

बची हुयी जिंदगी को
सुनहरी पलों से
सजाना चाहता हूँ,

निरंतर सुकून से
जीना चाहता हूँ
हँसते गाते जाना चाहता हूँ

जिंदगी की नयी किताब
लिखना चाहता हूँ,
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर




08-09-2010

मैंने जिन्दगी को करीब से देखा है

मैंने जिन्दगी को करीब से देखा है
भूख से बिलखते बच्चों को देखा है

आशियानों को उजड़ते हुए देखा है
दर्द में लोगो को तड़पते हुए देखा है

इश्क में आशिकों को जान देते देखा है
अपनों को अपनों से बिछड़ते हुए देखा है

अब देखने की इन्तहां हो गयी
खुदा के कानून की पहचान हो गयी

नहीं देखना चाहता हूँ,
कोई मंजर अब करीब से

निरंतर जीना चाहता हूँ,
अब सुकून से
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

08-09-2010

तय किया था कभी मोहब्बत नहीं करेंगें

तय किया था कभी मोहब्बत नहीं करेंगें
=======================
तय किया था
कभी मोहब्बत
नहीं करेंगें
दिल पर जख्म
नहीं खायेंगें
सोह्बते हुस्न की
चाहत नहीं रखेंगे
दिल लाख मचले
उसे काबू में रखेंगे
गुमान नहीं था,
कमज़ोर निकलेंगे
पता नहीं था
जल्दी से फिसलेंगे
मोहब्बत के जाल में
हम भी फसेंगे
चाहत की दुनिया से
कोई बचा नहीं अब तक,
कभी सोचा ना था
हम कैसे बच पाएंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
08-09-2010
शायरी,मोहब्बत 

मोहब्बत करने वाले, ऐलान नहीं करते

मरने वाले कभी,
 कह कर नहीं मरते
मोहब्बत करने वाले,
ऐलान नहीं करते
लम्हा लम्हा सब्र का 
इम्तहान देते हैं
आशिक के कूचें में,
जो रहते हैं 
मोहब्बत को 
बदनाम नहीं करते
जुल्म सह कर भी
कभी उफ़ नहीं करते
धोखा खा कर भी
क़ुबूल नहीं करते 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मेरे चमन के वीराने दिखते नहीं है

मेरे चमन के 
वीराने,
दिखते नहीं है
लदा है फूलों से 

पर उनमें  
महक नहीं है
मुस्कान से
पुते चेहरे के गम,
दिखते नहीं है
लब्जों से 

इत्मानान,
झलकता है 
पीछे छुपे दर्द,
दिखते नहीं है
लिबास से
ढके हैं जख्म,
दिखते नहीं है
सूख गए
अश्क रोते रोते
दिखते नहीं हैं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
गम ,शायरी,selected

 07-09-2010

E

रस्मे -मोहब्बत निभा देंगे

पास बैठ कर भी 
वो खामोश रहे 
तो कोई बात नहीं

हम भी बोलने ना दें  
तो कोई बात नहीं

इशारों से 
समझ जायेंगे
ना समझे
तो भी कोई बात नहीं

दिल दिल से ही 
गुफ्तगू कर लेंगे,
एक दूजे की बात 
समझ लेंगे

मन ही मन 
कसमें वादे भी 
कर लेंगे 
रस्मे-मोहब्बत 
निभा देंगे
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,

07-09-2010

बिना दस्तक दिए आ जाते हैं

दस्तक दिए बिना 
ख्यालों में आ जाते हैं वो
मेहमान बन कर
ख्यालों में रहते हैं वो
मचाते हैं तूफ़ान
फिर ख्यालों में वो
मेरे ख्यालों में
क्यूं मुक़र्रर नहीं रहते
ख्यालों में वो
न जाने
क्यूं समझते नहीं हैं वो
न इंतज़ार कराना पडेगा
न बार बार
ख्यालों में आने की
ज़हमत उठानी पड़ेगी
07-09-२०१०
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

07-09-2010
E

होश में भी बेहोश था

सारी बस्ती में अँधेरा था
रोशन घर का हर कोना था
खुशबू हिना की महक रही थी,
हवाएं बेहिसाब बहक रही थी
तुम जो बैठे थे मेरे अंजुमन में,
किसी और की क्या जरूरत थी
तुम्हारे आगोश में खोया था
हुस्न की मय पीकर मदहोश था,
तुमने आँखों से जो पिलाई थी,
उस की ही तो तासीर थी
कब रात गयी और भोर हुई
इसका कोई अंदाज़ न था,
मदहोशी का आलम था
होश में भी बेहोश था
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-09-2010

सोमवार, 6 सितंबर 2010

क्यों आखों में अश्क आते हैं



क्यों आखों में
अश्क आते हैं
क्यूं दिल के
जख्म बाहर आते हैं
लम्हा लम्हा तड़पाते हैं
जब वो रहे न हमारे,
क्यूं फिर याद आते हैं
अब तो माफ़ कर दो,
यादों से आज़ाद कर दो,
ज़ेहन को पाबन्द कर दो,
न उनका ख्याल आये
न कोई उनका नाम ले
या खुदा कुछ ऐसा
इंतजाम कर दो
सुकून से जीने दो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

मोहब्बत,यादें,शायरी 


06-09-2010

मन से अन्धेरा हटाओ


मन से 
अन्धेरा हटाओ
भाईचारे के 
उजाले से नहलाओ
प्रेम का लेप लगा कर
सोहाद्र से चमकाओ
अपनों को अपना
बना कर रखो
जो हुए नहीं अपने
उन्हें अपना बनाओ
खुद भी हँसो
उन्हें भी हँसाओ
खुद भी जीओ
उन्हें भी जीने दो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रेम,भाईचारा,सोहाद्र ,जीवन,मन,जीवन मन्त्र ,selected

06-09-2010

निरंतर चाहा था,हमेशा चाहूंगा

सोच में डूबा था,ख्यालों में खोया था,
तुम्हें अब भी खोज रहा था

क्या नहीं किया,तुम्हें  पाने के लिए,
खुद को भुला दिया,मंजिल पाने के लिए

हश्र क्या यही होना था मेरी कोशिशों का?

झूठ, ही सही,मुस्करा तो देते,
मेरी कोशिशों का,जवाब तो देते

मुझे गम नहीं है,
तुम्हारी चाहत में,जिन्दगी गवाने का,

आखिरी मौक़ा यही बचा है,
तुम्हें लुभाने का

जान गंवाकर ही सही,तुमको पाऊँगा,
निरंतर चाहा था,हमेशा चाहूंगा

06-09-2010

ये पत्थरों का शहर है

ये पत्थरों का शहर है,
यहाँ अश्कों का क्या काम
जहाँ पत्थर के बुत रहते हों,
वहां मोहब्बत का क्या काम
जहां जिस्मों में दिल नहीं
वहां दर्द का क्या काम
रंजो गम हो त्योंहार जहाँ,
वहां खुशियों का क्या काम
जहाँ रहते हो हाथों में खंजर,
वहां फूलों का क्या काम
जहां ज़हन में शक भरा हो
वहां ऐतबार का क्या काम
ये पत्थरों का शहर है....
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
06-09-2010

रविवार, 5 सितंबर 2010

क्यों नफरत में जीते हैं

मौत का इंतज़ार है,सफ़र जिन्दगी का,
कब्रिस्तान है मुकाम जिन्दगी का

तब क्यों नफरत में जीते हैं?
ये कौन सा हिसाब जिन्दगी का

प्यार ना हो जिस जिंदगी में,
क्या रखा है उस जिन्दगी में

निरंतर जीते हैं जो दरिंदगी में,
दोजख भी नसीब ना होगा
उन्हें किसी भी जिन्दगी में

05-09-2010
E