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शनिवार, 4 सितंबर 2010

अब तो कर दे दिल मेरे हवाले

मेरे दिल के उजाले में
ये रात की काली स्याही
किसने डाली,
मेरे मोम से ख्वाबों पर
ये आग किसने डाली
मेरी खामोशियों में
ये आवाज़ किसने डाली,
मेरे सुकून में
जलजला लाने वाले,
अब तो नकाब उठा दे,
अपने इरादे बता दे
या तो मेरे साथ हो ले,
या अपना पता बता दे
निरंतर जज्बातों से
खेलने वाले,
अब तो कर दे  दिल
मेरे हवाले
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
शायरी,मोहब्बत 
04-09-2010
E

मुलाक़ात तो हुई,मगर बात न हुई



मुलाक़ात तो हुई,मगर बात न हुई
=====================
सिनेमा हॉल में ,
बगल की सीट पर
बैठी थी ,
ख्यालों में खोयी थी
मन ही मन 
झिझक रही थी
कैसे कहूं ?
सोच में डूबी थी
दिखाने को नज़रें
परदे पर थी
मगर जान बगल में
अटकी थी
कहने को बातें 
बहुत थी,
बरसों से जो 
मन में बसी थी
उहापोह में,
वक़्त निकल गया
फिल्म ख़त्म हो गयी
जाने की बारी भी आयी 
ना मन को सुकून मिला
ना दिल को राहत मिली
मन की बात मन
में ही रह गयी
जो कहनी थी,
अनकही रह गयी
मुलाक़ात तो हुई,
मगर बात न हुई
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

शायरी,मोहब्बत 


E
10-09-2012

मैं उन्हें चाहता हूँ

वो मानें या ना मानें,
वो चाहें या ना चाहें
मैं उन्हें चाहता हूँ

लाख दूरी रखें,
मैं उन्हें करीब पाता हूँ
मेरी फितरत ही सही,
उनकी बेरुखी मेरी,
चाहत को बढ़ाती है

वो कहे या ना कहे,
ख्याल मेरा आता होगा,
जुबान पर ना सही,
जहन में तो आता होगा,

ऐसा नहीं की वो मुझे,
याद नहीं करते होंगे
नफरत से ही सही,
नाम तो लेते होंगे

इतना ही काफी है,
मेरे सुकून के लिए
निरंतर मेरे जूनून को,
कायम रखने के लिए

वो चाहें या ना चाहें
मैं उन्हें चाहता हूँ
04-09-2010
E

खुशकिस्मत हैं वो जिन्होंने, जिंदगी को दूर से देखा है

खुशकिस्मत हैं वो जिन्होंने,
जिंदगी को दूर से देखा है
सिर्फ चाहने वालों को देखा है,
लोगों को खुश होते देखा है
चिकने चुपड़े चेहरों को देखा है,
मीठे बोलते लोगों को देखा है
फंसे नहीं इश्क के जाल में,
सिर्फ इश्क करने वालों को देखा है
खुदा उनको ना फँसाये,
इश्क मोहब्बत के चक्कर में
जहाँ मकसद सिर्फ पाने,
और छोड़ने का होता है
मिल गया आशिक तो,
डर उसे खोने का होता है
ना मिला तो मकसद,
सिर्फ उसे पाने का होता है
हर हाल में 
इंसान चैन खोता है,
सुबह-ओ-शाम 
बेचैन रहता है
इसी चक्रव्यूह में 
जीता है,
इसी चक्रव्यूह में 
मरता है
खुशकिस्मत हैं वो जिन्होंने,
जिंदगी को दूर से देखा है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

04-09-2010
E

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

दिल से चाहा तुम्हें, बददुआ दे नहीं सकता


चोट कितनी भी पहुचाओं,
अब दर्द बढ़ नहीं सकता

जलाओ या दफनाओ,
कोई फर्क नहीं पड़ता 

जो खेल खेला है तुमने,
कोई खेल नहीं सकता

सिला मोहब्बत का जो 
दिया तुमने,
कोई  दे नहीं सकता

जो मेरे साथ हुआ ,
किसी के साथ हो नहीं सकता

तुमने जो भी किया,
जवाब उसका दे नहीं सकता

दिल से चाहा तुम्हें,
बददुआ दे नहीं सकता
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-09-2010
E

मेरे ख्यालों को उड़ान भरने दो

मेरे ख्यालों को उड़ान
भरने दो,
उन्हें खुले आकाश में
उड़ने दो
जो बीत गया उसे
जाने दो,
जो किया नहीं उसे
करने दो
ख्वाबों को हकीकत
बनाना है,
अब प्यार मोहब्बत से
जीना है
इक ऐसी दुनिया में
जाना है,
जिसमें मोहब्बत का नाम
जीना है
नफरत का नाम तक
सुना नहीं किसी ने
ना रोना है ना रुलाना है 
 ना ही कोई बेगाना है
दिन रात वहाँ पर
हंसना है  
मेरे ख्यालों को उड़ान
भरने दो,
उन्हें खुले आकाश में
उड़ने दो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-09-2010
E

वे आये या ना आये, अब फर्क नहीं पड़ता

वे आये या ना आये,
अब फर्क नहीं पड़ता

वो बुलायें या ना बुलायें,
अब फर्क नहीं पड़ता

जख्म इतने खाये हैं,
अब फर्क नहीं पड़ता

इतना दुतकारे गये हैं
इतना सताए गये हैं,
अब फर्क नहीं पड़ता

इतना तडपाये गये हैं,
अब फर्क नहीं पड़ता

अब गम की चादर ओढ़ ली,
खिजा से दोस्ती करली,
कुर्बान हसरत अपनी कर दी

ना ज़िंदा हूँ ना मुर्दा हूँ,
वक़्त कट जाये,
इस इंतज़ार मैं बैठा हूँ

बस दुआ खुदा से करता हूँ,
निरंतर इबादत करता हूँ

वे आये या ना आये,
अब फर्क नहीं पड़ता
03-09-2010
E

प्यार कितना भी करो , जाहिर ना करो

प्यार कितना भी करो ,
जाहिर ना करो

आग दिल मैं लगी हो,
जाहिर ना करो

दर्द दिल में होता है,
जाहिर ना करो

दिल कितना भी झूमे,
जाहिर ना करो

उनकी आहट से कुछ होता है,
ज़ाहिर ना करो

देख के उनको ख्याल आएँ,
जाहिर ना करो

ख्याल से उनके,खुमार आये,
जाहिर ना करो

वो ख्वाबों मैं आएँ ना आएँ,
जाहिर ना करो

वो तुम को सताएँ,
जाहिर ना करो

नज़र किसी की ना लगे,
मैं जुदाई से डरता हूँ,

दूर से ही सही,
प्यार दिल से करता हूँ,

वोह खुश रहें,महफूज़ रहें,
इतना ही काफी है

दूरी कितनी भी खले,
ज़ाहिर ना करो

निरंतर प्यार करो,
ज़ाहिर ना करो
03-09-2010
E

सच को स्वीकार करो


मेरी इल्तजा सुन ले,
मेरा प्यार कबूल कर ले
दिल से  तुझको चाहा है
मन से अपना माना है
ये बात जुदा है ,
तुम हाँ नहीं भरोगी,
जिझकती रहोगी
जानता हूँ ,
तुम मुझे चाहती हो,
पर दुनिया से घबराती हो
कहना चाहते हुए भी ,
कह नहीं पाती हो
कब तक छुपाओगी,
कब तक सताओगी
सच से पर्दा हटा दो
अब उसे सामने आने दो
खुल कर इज़हार करो ,
सच को स्वीकार करो
इल्तज़ा कबूल करो
इल्तजा कबूल करो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रेम,इल्तजा,मोहब्बत,झिझकना

03-09-2010
E


गुरुवार, 2 सितंबर 2010

सांवरा है रंग तेरा

सांवरा है रंग तेरा,
नटखट है ढंघ तेरा,
गोपियों संग
तुमने रास रचाया
सारथी बन अर्जुन को
महाभारत का युद्ध जिताया
गीता का उपदेश दिया,
जग को तुमने कर्म सिखाया
भक्तों से तूनें प्यार किया,
निरंतर प्रेम का पाठ पढ़ाया
मीरा को तुमने भक्त बनाया
सुदामा को मित्र बनाया
पापियों का नाश करा,
कंस को परलोक पहुंचाया
सांवरा है रंग तेरा,
नटखट है ढंघ तेरा,
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

02-09-2010
(कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर सप्रेम समर्पित)

मेरा यार मुझसे रूठ गया

मेरा यार मुझसे रूठ गया,
मुझ को अकेला छोड़ गया

नज़रों से ओझल हो गया,
दिल को बोझिल कर गया

जाने कहाँ वो खो गया,
दिल गम में मेरा डूब गया

मिला कर हाथ में हाथ,
निकले थे सफ़र में साथ

खुद आगे निकल गया,
पीछे मुझ को छोड़ गया

बावफा,,बेवफा हो गया,
जुदा मुझ से हो गया

हसरत अधूरी रह गयी,
चाहत भी पूरी ना हुई

वादे तोड़े,नाते तोड़े,
तोड़ी कसमें सारी

मुझ को तो छोड़ा सो छोड़ा,
छोडी दुनिया सारी

किस से करूँ शिकवा,
किस से करूँ शिकायत

दिल देने वाला ही,
दिल तोड़ गया

निरंतर खोज रहा हूँ उसको,
जो मुझ से रुस्वां हो गया

मेरा यार मुझसे रूठ गया,
मुझ को अकेला छोड़ गया

02-09-2010

ये तो पैगाम ना दो

तुम्हारे इश्क में डूब गया था,
बिन पिये ही नशा हो गया था

बेखबर था इश्क के अंजाम से,
आने वाले हादसे के डर से

तुमने मुहँ मोड़ लिया,
मुझको झकजोर दिया

बेरुखी से दिल तोड़ दिया,
सुरूर मेरा उतार दिया

काम मेरा तमाम हो गया,
किस्सा अब आम हो गया

अब क्यों खबर रखोगे?
फ़िक्र अब क्यों करोगे?

दिल तुम्हारा भर गया,
खेल पुराना, पूरा हुआ

इक बात तुम भी सुन लो,

दिलों को जख्म देना छोड़ दो,
जज्बातों से खेलना छोड़ दो

प्यार को शौक का नाम ना दो,
चाहने वालों को ऐसी सौगात ना दो,

कोई प्यार ना करे किसी से,
"निरंतर"ये पैगाम ना दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,मोहब्बत

02-09-2010

बुधवार, 1 सितंबर 2010

इस बार तो मुझे अपना बनाएँ

उनकी मुस्कराहट को,
मैंने निमंत्रण समझा
इशारे को उनकी हाँ समझा

इस खामोख्याली में,
उन्हें अपना समझा
सलीके को उनके,
मैंने प्यार समझा

इस भूल में गाफिल हुआ,
जो हुए ना मेरे
उन्हें सब कुछ समझा

होश आया तो वो पास नहीं थे
समझा था जिन्हें ख़ास,
वो साथ नहीं थे

गलत फहमी में जी रहा था
मेरे गुनाह का दोष,
निरंतर उनको दे रहा था

उनसे माफ़ी चाहता हूँ
इसी बहाने उनका,
दीदार चाहता हूँ

शायद फिर मुस्कराएँ
इस बार तो मुझे अपना बनाएँ

31-08-2010

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

दिल अपना बहलाते हैं

दिल अपना बहलाते हैं
प्यार किसी से भी करें

खुश अपने को रखतें है
प्यार तो बहाना है

दस्तूर ही निभाना है
ख़ुशी से जो जीना है

साथी बदल जाये
मांझी बदल जाये

मकसद वो ही रहता है
साहिल वो ही रहता है

दिल किसी का भी टूटे
निरंतर दिल बहलाते हैं

इस कोशिश में अपनी
क़त्ल दिलों का करते हैं

प्यार किसी से भी करें
दिल अपना बहलाते है

31-08-2010

मैं चलता रहूँगा

पथ कितना भी विकट हो
कंकर ,पत्थर काँटों से भरा हो
हर कदम अवरोधों से अटा हो
मैं अनवरत चलता रहूँगा
अविरल नदी सा बहता रहूँगा
निरंतर आगे बढ़ता रहूँगा
रुकावटें रोक नहीं पाएंगी
विपत्तियाँ डिगा नहीं सकेंगी
बुलंद इरादों को तोड़ नहीं पाएंगी
मुझे तलाश है, सुनहरी कल की
आज से बेहतर विकल्प की
प्यार-मोहब्बत के संसार की
उत्साह,आनंद अपनत्व की
मैं चलता रहूँगा अब ना रूकूंगा
लक्ष्य की ओर  बढ़ता रहूँगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
लक्ष्य,कर्म,जीवन,

01-09-2010

दिल मचल रहा है

उनके इन्तजार में
दिल मचल रहा है,
बेकाबू हो रहा है,
,बेसब्री से उछल रहा है

वे आयेंगे,गले लगायेंगे ,
बिताये हुए पलों को,
फिर दोहरायेंगे

मरुधर में
हरियाली आयेगी,
खिजा में बहार छायेगी

वीराना आबाद होगा,
सारा जहाँ हमारा होगा

संगीत फिर बजेगा,
सुर फिर सजेगा,
रुका हुआ पानी फिर बहेगा

अब अपने पास रखूंगा,
फिर ना जाने दूंगा,
"निरंतर"प्यार किया था,
अब भी प्यार करूंगा

हमेशा दिल में रखा था,
अब भी दिल में रखूंगा,

एक बार खोया था,
फिर ना खोउंगा,

बामुश्किल जुड़े दिल को,
फिर टूटने ना दूंगा

जो भूल हुई थी पहले,
अब ना दोहराऊँगा,
नाइत्तफाकी को,
इत्तफाकी मे बदल दूंगा

दिल मचल रहा है,
उनसे मिलने के
ख्याल में,बेकाबू हो रहा है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,मोहब्बत

31-08-2010

सोमवार, 30 अगस्त 2010

ना थको ना हारो, निरंतर चलते रहो

समुद्र में अठखेलियाँ करती लहरें
अनवरत किनारे को छूने को
प्रयासरत रहती हैं
शीत,जेठ,बसंत मौसम कोई भी हो
मिलन को व्याकुल रहती हैं
अनगिनत जीव जंतुओं को समेटे
खुद अधूरी रहकर उनको जीवन देती
किनारे से मिलन की इच्छा,
कभी तृप्त नहीं होती
किनारों को छूने भर से
तड़प कम नहीं होती
सूर्य की किरणें चाँद की चांदनी भी
उन्हें विचलित नहीं कर पाती
मिलन-इच्छा प्रबल बनाती
किनारे को पाने की चाह में,
बार बार नए वेग से आती
चाहत और संकल्प का सन्देश देती
हृदय में प्यार हो लक्ष्य को पाना हो
न थको न हारो,
कर्तव्य पथ पर चलते रहो
निरंतर कर्म में लगे रहो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रेम,जीवन,कर्म,लक्ष्य,कर्तव्य
30-08-2010

रविवार, 29 अगस्त 2010

ख्यालों को ज़हन से जुबां पर लाओ

ख्यालों को ज़हन से जुबां पर लाओ

बंद कमरे से खुली हवा में लाओ

ख्याल अपने सारे जहां को बताओ

चुभेंगें तीर दिल से कालों के

भरा हुआ जहर जिनके इरादों में

मीठा बोल,मलहम ना लगाओ

हकीकत से उन्हें रूबरू कराओ

बरसो से लदे बोझ को हटाओ

"निरंतर" खुली हवा में जियो

उन्हें भी जीना सिखाओ

29-08-2010

हम तो जिए जायेंगे

रंग बदलती दुनिया में
कैसे पहचानें,
ना मिलने के बनाते हैं,
जो नित नए बहाने

बामुश्किल मिल गए,तो
सुनायेंगे नए अफ़साने,
कब किस रंग में दिखंगे,
ये सिर्फ खुदा जाने

किस पर यकीन करें,
ये कौन पहचाने?
मुस्कराहट के पीछे का सच,
सिर्फ वो जाने

इंतज़ार में जिए थे,
अब भी जिए जायेंगे
पहले छले गए थे,
फिर कब छले जायेंगे?

पहले भुगता है,
निरंतर भुगतेंगे,
पहले चोट खाई है,
फिर चोट खायेंगे

दिल में दर्द,पर
 लबों पर मुस्कान लायेंगे,
हमें तो जीना है
,हम तो जिए जायेंगे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

28-08-2008