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शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

कोई कुछ भी कहे, कोई बात नहीं

वो देख कर 
मुस्कराये भी नहीं,
कोई बात नहीं
नाव मंझधार में
 फँसी है,
कोई बात नहीं है
दिल उनको दे दिया
वो लौटा भी दें 
कोई बात नहीं
मैं उनको चाहता हूँ,
वो ना चाहे 
कोई बात नहीं
दिल ही तो टूटा है,
कोई बात नहीं
वो ठुकरा भी दें 
कोई बात नहीं
मुझे मंजिल का 
पता चल गया है
मोहब्बत के 
दिए की लौ कभी 
बुझेगी नहीं 
कोई कुछ भी कहे,
कोई बात नहीं
***************
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत प्यार, 
20-08-2010

दिया जल गया

जब तेरा नाम आया

तूं मुझे याद आया

दिल बेचैन हुआ

सोते से जग गया,

बुझा हुआ दिया

फिर से जल गया
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,

20-08-2010

गुनाह करते रहे

जिन्हें मोहब्बत का
मतलब भी मालूम नहीं था
हम उन्हें शहर में ढूंढते रहे
जो करते थे प्यार हमसे
वो तन्हाई में जीते रहे
न वो कह सके,
न हम समझ सके
हम तो गुनाह करते रहे,
हम पर भी गुनाह होता रहा
न हम उनके हो सके,
न वो हमारे हो सके
मंज़िल कहीं और थी
हम कहीं और भटकते रहे
ख्वाब,ख्वाब ही रह गए
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
20-08-2010
प्यार,मोहब्बत,शायरी,सपने

कविता पढ़ना सीख लो

कविता पढने का किसको वक़्त है,
सब अपने आप मैं मस्त हैं

मसले सबके एक है,
मंजिल सबकी एक है
रास्ते सबके जुदा सही,

अकेले ही लड़ते हैं,
"निरंतर"पस्त होते हैं

इंसान की फितरत जो ठहरी,
अहम् है सबसे जरूरी

जो मिल बाँट कर सोच लें,
मसले सारे हल कर लें

भूल जाओगे तनाव सब,
यह है जीवन का सच

जिन्दगी की हकीकत को,
लब्जों मैं उतारा है,
ख्याले दिल जहन से निकाला है

तुम मेरे हो,मैं तुम्हारा हूँ,
जो मैंने भुगता है,तुम ना भुगतो

मेरे अनुभवों से सीख लो,
कविता पढ़ना सीख लो

20-08-2010

जीना सीख लिया है

अब रोना छोड़ दिया है,
मैंने हँसना सीख लिया है


पहले मै रोता था,वो हंसते थे,
अब मै हंसता हूँ,वो रोते हैं

चुप रह कर,फिर हंस कर
जवाब देना सीख लिया है

मैंने जीना सीख लिया है,
"निरंतर"हँसना सीख लिया है

20-08-2010

हम तो गुनाहगार थे

जिन्हें दूंढ रहा था शहर मैं,
वो बैठे थे आस्ताने मैं

जो करते थे प्यार छुप के,
क्यूं नज़र नहीं आये हमको

निरंतर"भागते रहे उनके पीछे,
जो पीछा छुडाते थे हमसे

हम तो गुनाहगार थे,
हम पर भी गुनाह होता रहा

ना हम उनके हो सके,
ना वो हमारे हो सके

19-08-2010

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

ज़माना बदल गया है

ज़माना बदल गया है,
पैमाना बदल गया है
अपनों से खार खाना,
दस्तूर बन गया है
बेदर्दी से दिल तोड़ना,
खेल  हो गया है,
कंधे पर  हाथ,
दिल मैं आग
पीठ मैं खंजर मारना
फैशन हो गया है,
राजनीती को धंधा
मानने वालों को देश सेवक,
देश सेवकों को बीता हुआ
कल कहा जाता हैं,
दूसरों के दुःख मैं सुखी,
बताये खुद को सबसे दुखी ,
उनको शुभ चिन्तक,
गाली देने वालों को
तहजीब का पहरेदार
कहा जाने लगा है
मौत पर हाजरी का,
दस्तूर निभाया जाता है,
शमशान मैं ही शाम का,
प्रोग्राम बनाया जाता है
वेलेंटाइन डे,
सबसे बड़ा त्योंहार हो गया है,
अपने को सबसे बेहतर,
बताना जरूरी हो गया है,
पैमाना बदल गया है,
ज़माना बदल गया है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


19-08-2010

उन्हें फर्क नहीं पड़ता

अश्क कितने भी बहाऊँ,
उन्हें फर्क नहीं पड़ता
बेगुनाही के
कितने भी सबूत दूँ
उन्हें फर्क नहीं पड़ता
पैरोकार कितने भी लाऊं,
उन्हें फर्क नहीं पड़ता
हमदर्द कितने भी मिलाऊं,
उन्हें फर्क नहीं पड़ता
ख़ुशी के लम्हे याद कराऊँ,
उन्हें फर्क नहीं पड़ता
वो हो गए है पत्थर दिल
कितना भी मनाऊँ
उन्हें फर्क नहीं पड़ता
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

19-08-2010

जिन्दगी रोज़ आजमाती है


जिन्दगी
रोज़ आजमाती है,
नित नए
गुल खिलाती है
बामुश्किल भूला जिनको
उनकी याद दिलाती है
कभी गम के माहौल में 
ख़ुशी देती है,
कभी
माहौल -ऐ- खुशी में 
गम देती है
जिन्दगी रोज़ नया
मंज़र दिखाती है 
कल जो दिखाते थे 
खंजर हमको,
आज पहनाते हैं
हार हमको
कल जो देखते थे 
चाँद साथ में  ,
आज चाँद से
हाथ हिला रहे हैं 
जिन्दगी का खेल
कमाल का है,
मसला हर
जान का है
जिन्दगी
रोज़ आजमाती है,
नित नए
गुल खिलाती है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
19-08-2010
E

दूंढने निकला हूँ

तुम्हें दूंढने निकला हूँ
तलवे छिल गए,चलते चलते
पर पैर ना थके,चलते चलते

रास्ते नापे,शहर के सारे
बदनाम हुए हम,तेरे मारे

ना तुम मिली,ना घर मिला
क्या   दूंढ  रहे   हो  ?
सुनने को,सवाल मिला

दिल से दूंढा था "निरंतर"
फिर ये कैसा,सिला मिला

हारा नहीं हूँ,घबराया नहीं हूँ
सुबह शाम,तुम्हें तलाशूंगा,

ना हारूंगा ना हार मानूंगा,
हर हाल मैं दूंढ निकालूँगा

तुम्हें दूंढने निकला हूँ,
तुम्हें दूंढ कर लाऊँगा
***************
डा.राजेन्दर तेला,निरंतर

19-08-2010

बुधवार, 18 अगस्त 2010

तुम्हें दिल से ,याद करता हूँ

तुम्हें रोज़ नमन करता हूँ,
तुम्हें दिल से ,याद करता हूँ
यहाँ-वहां,तुम्हें दूंढता हूँ

तुम्हें गए ज़माना हो गया
पर अब भी मोहब्बत करता हूँ

हालात से हाथ मिला लिया
किसी तरह जीना सीख लिया

जिंदगी ऐसे ही गुजारनी होगी
अब तो ख़ामोशी रखनी होगी

तुम भी याद करती होगी
मुझे जन्नत से देखती होगी,

मेरा इंतज़ार करती होगी
मुझे भी सब्र रखनी होगी

तुमसे मुलाक़ात
ज़न्नत में ही करनी होगी
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर

....

18-08-2010

नयी कहानी

किसी से कुछ नहीं कहूंगा,
सब अकेले ही सहूँगा

जो हुआ है मेरे साथ,

दिल मैं ही रखूंगा,
भेद कभी ना खोलूंगा,

फिर भी नाउम्मीद नहीं हूँ,
यकीन से महरूम नहीं हूँ

ठुकराया गया हूँ,
फिर भी तलबगार तुम्हारा हूँ

एक दिन ऐसा आयेगा,
फैसला बदल जाएगा

तुम खुद आओगी,
मुझको मनाओगी,

पिछली बातों को भूल,
मुझे अपना बनाओगी

मोहब्बत की"निरंतर",
नयी कहानी सुनाओगी


18-08-2010

जो होना है वो होता रहेगा

जो लिखा कर लाये हो
वो हो कर रहेगा,
क्यों करते हो फ़िक्र,
जो भी होना है
वो होता रहेगा
जब रब पर
ऐतबार किया
फिर डरना क्या
जिसने दर्द दिया
वो ही दवा देगा
कोई दया करे
तो कह देना
मुझे कमजोर ना
बनाओ ,
केवल होंसला बढ़ाओ
जो भी करो,
उसमें जान लड़ाओ
नतीजे को
किस्मत का
तमगा ना पहनाओ,
कर्म के दम पर ही,
सफलता पाओ
फ़िक्र ना करो
तुम्हें क्या होगा ?
जो होना है
वो हो कर रहेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
18-08-2010
भाग्य,किस्मत,जीवन
E

दिल का बोझ

जो कह ना सका मुंह से,
वो लिख कर बता दिया

इसी बहाने बोझ,
दिल का उतार दिया

जाहिर ख्यालात करने थे,
सो कर दिए

करी थी हिम्मत पहले भी,
आवाज़ उठाने की

शोर इतना हुआ की,
आवाज़ मेरी दब गयी,

जो चाहते नहीं थे ,
तरकीब उनकी काम आ गयी

सोच मैं डूब गया,
सवाल खुद से किया

कब तक चुप रहोगे?
जमीर से अपने,खुद कैसे लड़ोगे?

इस सोच ने मुझे जगाया,
फैसला मुझ से कराया

दबे हुए ख्याल,
खुली हवा मैं लाऊंगा

चाहे कुछ भी हो जाए,
जरिये-कलम,सच को सच,

झूठ को झूठ बताऊँगा,
आवाज़ अपनी उठाऊँगा,

जो कह ना सकूंगा मुंह से,
वो लिख कर मैं बताऊँगा

17-08-2010

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

बात आगे बढाओ

कर रहा हूँ“निरंतर”मैं,
इन्तजार तुम्हारा,
अब तो दे दो मुझे सहारा

दीवाना तब से हूँ,
जब से हुआ दीदार तुम्हारा,

नैन तो मिले थे,
मेरे नैनों से,
पर तेरा दिल ना मिला,
मेरे दिल से

तुमसे मिलने की आशा मैं,
वक़्त गुजर गया,
मैं भी जहां रुका था,
वहीँ रुका रह गया

अब तो आगे बढ़ने दो,
साथ मुझे अपना दे दो
इतने निष्ठुर ना बनो,
हाथ अपना मेरे हाथ मैं दे दो

ये वादा है मेरा,
करूंगा प्यार इतना तुमसे,
जितना करे चाँद,चांदनी से

अब तो आओ
मुझे अपनाओ,
अपना बनाओ


मेरी रुकी हुई जिन्दगी को,
गति मान बनाओ,

और ना सताओ,
बात आगे बढाओ,
बात आगे बढाओ


17-08-2010

कातिल



वो आये थे,ज़िन्दगी में ,
बहार बन कर,

निरंतर रहे मुस्कान बन कर
गए बीता हुआ कल बन कर

बहारों का आना,
जी भर के मुस्कराना,
धुंआ बन उड़ जाना,

ग़म--हयात छोड़ जाना,
अफसानों  का यही फसाना

आज हमने भुगता है,
कल तुम  भुगतोगे

आज हम रो रहे
कल तुम भी रोओगे

हमारे कातिल तुम बने हो,
तुम्हारा कोई और बनेगा

ना हम बच सके ,
ना तुम बच सकोगे

17-08-2010

रुकावटें

सपाट सड़क पर,
गाडी तेज दौड़ती है
मंजिल भी आसान,
और करीब लगती है

अचानक आये खड्डे से,
गाडी असंतुलित हो,
दुर्घटनाग्रस्त हो सकती है ,

जीवन यात्रा ऐसी ही होती है ,
बिना रुकावट अच्छी लगती है,
मंजिल भी करीब लगती है

अनचाही घटना इंसान को,
व्यथित और विचलित कर देती है

जीवन यात्रा मैं,
रुकावटें कभी भी आ सकती हैं
रुकावटों से व्यथित ना हों,

वे मजबूती और धैर्य देतीं हैं
आने वाले तूफानों से,
लड़ने की शक्ति देती हैं

सबक ले,संयमित जीवन जियें
असंतुलित,जीवन प्रणाली से दूर रहें

कर्म करें,देर से ही सही ,
जीवन यात्रा सफल करें

17-08-2010

सोमवार, 16 अगस्त 2010

जोड़ -तोड़


बड़े शौक से
एक एक फूल जोड़ कर,
गुलदस्ता बनाया
भिन्न भिन्न रंगों के
फूलों से बहुरंगी बनाया
शीशे के गुलदान में सजाया
गुलदस्ते को देख कर
ह्रदय तृप्त
मन खुश हो गया
तभी हवा का झोंका आया
गुलदान ज़मीन पर
गिर कर टूट गया 
एक एक फूल बिखर गया
मेहनत पर पानी फिर गया
जोड़ना कितना मुश्किल
तोड़ना कितना आसान है
आज समझ आ गया
16-08-2010
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर      

किस किस को समझाएँ

किस किस को समझाएँ
दर्द भरे अफ़साने कैसे सुनाएँ
जो गुजरी हम पर
किस मुँह से बताएँ,
जब अपने ही चाल चल गए,
पीठ पीछे से वार कर गए
वफ़ा का दम
भरने वाले ही दगा कर गए
किसी और से क्या उम्मीद करें
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
उम्मीद,अफ़साने,वफ़ा,शायरी

 
16-08-2010

रौशनी

काली अँधेरी रात मैं,
एक तारा टूट गया,

टूटते टूटते भी रौशनी का,
मंजर दिखा गया

सब को इक दिन जाना है,
जिन्दगी का यही फसाना है

ऐसा कुछ कर जाओ"निरंतर,
याद हमेशा आओ

जाते जाते तो ज़माना,
रौशन कर जाओ

16-08-2010

मयस्सर नहीं अब ख़ामोशी भी मुझको

मयस्सर नहीं अब ख़ामोशी भी मुझको
ना जाग सकूं ना सो सँकू याद करके उनको
अब दिल में शोर हो रहा उनकी यादों का
जब साथ थे तो खौफ था उनके बिछड़ने का
न जाने ये कैसा अंदाज़ है उनके सताने का,
किश्ती में बैठा कर पतवार हटाने का
जब बिछड़ना ही था तो मिले ही क्यों थे?
जब जाना था दूर तो पास आये ही क्यों थे?
मुझे इतना मुस्तकिल बना ऐ मेरे खुदा,
ना हो सके कोई मेरा मुझसे कभी जुदा
लगा ना सके कोई आग ज़िंदगी के पानी में
छल नहीं सके कोई छोटी सी जिंदगानी में
मैं ही जानता हूँ कैसे गुजरता है वक़्त मेरा
मुन्तजिर हूँ,तुम्ही ही करोगे बेडा पार मेरा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत,यादें ,ज़िंदगी,शायरी
16-08-2010

रविवार, 15 अगस्त 2010

स्वतंत्रता दिवस पर कविता -आजादी के पर्व को नए सोच से मनाएँ

आओ 
आजादी के पर्व को
नए सोच से मनाएँ
भूल गए जिन शहीदों को
उनका क़र्ज़ चुकाएँ 
त्याग और बलिदान,
देने वालों को याद करें 
आज़ादी के परवानो को
अब तो प्रणाम करें 
समय आ गया है,
भय मुक्त समाज बनाएं 
भ्रष्टाचार  के रोग को
सदा के लिए मिटाएं 
तन मन धन से 
अपना फ़र्ज़ निभाएं 
आने वाली पीढ़ी को
नयी राह दिखाएँ ,
अब तक जो भूल हुई हमसे 
उसको फिर ना दोहराएँ
जो पाप किये हैं 
उनको अब धो डालें 
जो किया नहीं अब तक
अब तो कर डालें 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


15-08-2010

आज़ादी,स्वंत्रता ,स्वंत्रता दिवस,शहीद ,देश भक्त 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

भँवरे

भंवरा उड़ रहा था,फूलों पर मंडरा रहा था
मंत्र मुग्ध करने वाला,गुंजन कर रहा था,

ललचाती हुई नज़रों से,शिकार दूंढ रहा था,
अपना बनाने की चाह मैं,फूलों को लुभा रहा था

एक फूल उसके जाल मैं,फँस गया
भँवरे की अदाओं ने,मोहित उसे कर दिया

उसने प्रणय निवेदन,स्वीकार कर लिया
भँवरे ने देर नहीं लगाईं,फूल से आलिंगनबद्ध हो गया

रसस्वादन करने लगा,फिर तृप्त हो उड़ गया
फूल को निर्जीव और असहाय छोड़ गया

भँवरे और फूल की कहानी तो पुरानी है,
बार बार कही जाती है,"निरंतर"दोहराई जाती है

भँवरे का सम्मोहन,फूलों को आमंत्रण
फिर उनका आलिंगन,बाद मैं क्रंदन

ऐ खुदा अब तो रहम फरमाओ
फूलों को ऐसे भंवरों से बचाओ....

15-08-2010

सवाल

मेरे कद्रदानों को, मुझ से शिकायत है,
वो फिर भी चाहते हैं,क्या कम इनायत है

वो सोचते हैं,मैं उनसे दूर हूँ,
पर मैं भी तो मजबूर हूँ

दिल जितना लगाऊँगा,
जाने के बाद उतना ही सताऊँगा

मेरी दूरी ही है,उनसे नजदीकी,
कहीं हो ना जाए कोई अनदेखी

बस इसी बात से डरता हूँ,
"निरंतर"ख्याल दिल का
दिल मैं छुपा कर रखता हूँ

मैं भी प्यार का,इज़हार करना चाहता हूँ,
उनको इस सच से,रूबरू कराना चाहता हूँ

मेरी चाहत का अहसास,उन्हें कैसे कराऊँ?
मैं भी उतना ही चाहता हूँ,उन्हें कैसे बताऊँ?

उनकी चाहत का,हिसाब कैसे चुकाऊँ?
हाले दिल कैसे सुनाऊँ?

इसी सोच मैं वक़्त बीत गया,
मुझे असमंजस मैं छोड़ गया...

सवाल फिर जहन मैं रह गया,
सवाल फिर जहन मैं रह गया....

15-08-2010

सुकून से रहने दो



खाक मैं लेटा हूँ मुझे,
लेटा ही रहने दो
चैन से सो रहा हूँ,
मुझे चैन से सोने दो

बड़ी मुश्किल से ,
अरमान पूरे हुए उनके
बड़े शौक से डाली थी ,
ख़ाक मेरे अपनों ने
क्या नहीं किया,
इसके लिए उन्होंने

हम देखते रहे उनको
आँखें भर भर के 
 किस कदर बेगाना किया
मुझको मेरे अपनों ने 

उफ़ भी ना करी ,
उनकी दरियादिली पर
खैर मनाई ,
उनसे दूर जा कर
कैसे यकीन दिलाऊँ,
कितना खुश नसीब हूँ
सुकून से हूँ,
उनसे दूर जो हूँ

वो फिर भी बेसुकून हैं
सच से मगर दूर हैं

दिल मैं उनके अब भी
दर्द होता होगा
हर लम्हा मेरा चैन
उन्हें सताता होगा

मैं क्या करूँ?
यह उनके सोचने का ढंग है
सोच जैसा ही,
उनका जीवन भी बदरंग है
ज़िंदा था तब मेरे चैन ने
तंग किया था उनको,
अब मेरा चुप होना भी
बेचैन करेगा उनको

खोद रहे खुद अपनी कब्र
मुझको तो इसी मैं सब्र

ख़ाक डालने वाला भी
नहीं मिलेगा,उन्हें कोई कब्र पर

क्या कम होगा खुदा का ,
यह अहसान मुझ पर

अपनी मौत ही मरेंगे,
कब्र में भी बेचैन रहेंगे
जिस तरह जिए हैं ,
उसी तरह मरेंगे

नफरत से जीने वालों का
यही अंजाम होता
इंसान नहीं तो क्या,
खुदा तो इंतकाम लेता है

अब मुत्मैन हूँ ,
इस माहौल मैं चैन से हूँ
क्यूं उनकी चिंता करूं
वक़्त अपना बर्बाद करूँ

चैन से सो रहा हूँ,
मुझे चैन से सोने दो
कम से कम अब तो,
सुकून से रहने दो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
14-08-2010
E