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शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

परिंदा


बहाना दूंढ़ ही लेते हैं
वो मुहं छुपाने का
यह अंदाज़ है
उनका हमें सताने का
उनकी अठखेलियाँ
नित नयी पहेलियाँ
ना मिल पाने की
नयी नयी कहानियाँ
अगर वो
हमारे दिल में ना होते,
तो हम भी
इतने बेचैन ना होते
कब तक मुह छिपायंगे
हमसे दूर भागेंगे,
हमें तो आदत हैं
बर्दाश्त कर लेंगे
हमेशा इंतज़ार किया हैं,
अब भी कर लेंगे
यकीन हैं हमको
हवा का रुख बदलेगा,
वक़्त भी साथ देगा
एक दिन वो आएंगे
हमें अपना बनायेंगे,
इसी यकीन पर जिन्दा हूँ
उड़ने के इंतज़ार मैं,
बैठा एक परिंदा हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,

13-08-2010

सपने तो सपने हैं,

सपने तो सपने हैं
किसके पूरे हुए
मैंने तो जिस से भी पूछां,
उसके अधूरे रह गए
इंसानी फितरत है,
असफल हो कर भी,
नया सपना देखते हैं
आशा तो दिलाते हैं,
पर भ्रम में रखते हैं,
रक्त संचार तो बढ़ाते हैं
मगर सत्य से दूर करते हैं,
पूरा नहीं होने पर,
निराशा का भाव लाते हैं,
कमजोर भी बनाते हैं,
सपनों की मरीचिका में,
हकीकत को छोड़,
"निरंतर”
नए जाल बुनते हैं,
बार,बार फंसते हैं
सपने तो देखो ,
झूठी आशा ना बांधों
कर्म से मंजिल पाओ
सपने तो सपने हैं,
किसके पूरे हुए
जिस से भी पूछा
उसके अधूरे ही रहे
-------
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सपने,भ्रम,मरीचिका,
12-08-2010
E

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

अब तो सिर्फ कहानी है


अब ना गम से ना,
ख़ुशी से फर्क पड़ता
ना किसी के आने,
जाने से फर्क पड़ता
दिल के चारागर ही
चले गए,
गम और ख़ुशी 
साथ ले गए
कल तक करते थे
जो दिल को रोशन
अन्धेरा पीछे छोड़ गए
अब कहीं कोई उम्मीद,
नज़र नहीं आती
धरती आकाश से मिल
नहीं सकती
उनकी वापसी हो 
नहीं सकती ,
क्या दुआ करूँ
क्या इबादत करूँ
अब सारी बातें 
बेमानी हैं,
अब तो सिर्फ 
कहानी है
अब तो सिर्फ 
कहानी है
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर
चारागर  =चिकित्सक ,Doctor
12-08-2010

E

सोमवार, 9 अगस्त 2010

डाकिया


डाकिये 
का थैला भी
एक अजब पिटारा है
ख़ुशी और गम का
मिला जुला नजारा है
किसी को हँसाए
किसी को रूलाए
इंतज़ार सब को 
कराए
गाँव हो या शहर
वर्षा हो या शरद
बांटे ख़ुशी और गम
चेहरे पर  भाव नहीं
मन पर प्रभाव नहीं
चाहे कुछ भी हो जाए
"निरंतर" चलता जाए,
डाक पहुंचाता जाए
डाकिये का थैला भी
एक अजब पिटारा है,
ख़ुशी और गम का
मिला जुला नजारा है
09-08-2010

जुबान

उनकी बातों को
दिल से ना लगाना
उन्हें तो आता है
सिर्फ मखौल उड़ाना
उनकी बेबसी पर
तरस आता है"निरंतर"
कितने सताए गए होंगे?
कितने निराश हुए होंगे ?
जुबान की
मिठास ही खो दी
दुआ करता हूँ
खुदा उनको सुकून दे
मीठी जुबान
उन्हें वापस कर दे
तीखे अंदाज़ को
मिठास में बदल दे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जुबान,जीवन,


09-08-2010

धर्म

सारे
ताम झाम के साथ
ऊंचे आसनों
पर बैठ कर
धर्म गुरु बताते है
धर्म क्या है ?
मेरे ईश्वर ने
इतना ही बताया
मनुष्य को
मनुष्य समझो  
दुःख में
साथ निभाओ
खुशियों में
खुश रहो
यही धर्म है
यही धर्म है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
धर्म,ईश्वर,

09-08-2010

डर

पर्वत दूर से
सुन्दर लगते हैं
पास से
बदसूरत दिखते हैं
जो जिस्म से
पास होते हैं
मगर दिल से
दूर रहते हैं
बड़ी मुश्किल से बर्दाश्त
किया निरंतर उनको
कब मारेंगे खंजर
कब करेंगे वार
ऐसों से लगता है
डर मुझको
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
09-08-2010

शून्य या विराम

कल क्या होगा शून्य या विराम?
या बेहतर होगी कल की शाम?

अच्छे कल की आस लिए भी,
काम वही करते हैं
उसी ढंग से जीतें हैं

कल को अच्छा बनाना है,
तो सुनलो बात"निरंतर" की

ना शून्य की सोचो ना विराम की
ना शून्य की सोचो ना विराम की

08-08-2010

फूल खिलते हैं

फूल खिलते हैं
तोड़े जाते हैं
हर समारोह की
शान बढ़ाते हैं
और मुरझा जाते हैं,
हमारी ख़ुशी के लिए,
अपनी कुर्बानी देते हैं
और हम
उन्हें भूल जाते हैं,
स्वार्थ में केवल
अपनी खुशियों से
मतलब रखते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

08-08-2010

तितलियाँ


सूर्य के
आगमन से
पलायन तक,
रंग बिरंगी
तितलियाँ
निरंतर
रन बिरंगे फूलों पर
मंडराती हैं,
उनकी सुंदरता
बढ़ाती हैं
क्या हम
तितलियाँ नहीं
बन सकते
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

08-08-2010

ओस

हरे पत्तों पर ओस की बूंदें

नन्हे मोतियों सी,
चमक लेकर लुभाती हैं,

सूरज की गर्मी से
भाप बन उड़ जाती हैं

आना और जाना,
"निरंतर" प्रक्रिया है

जब तक रहना है
ओस की बूंदों सा चमकना है,

हमें भी एक दिन उड़ जाना है,
हमें भी एक दिन उड़ जाना है

08-08-2010

सोचता तो हूँ

"निरंतर",
सोचता तो हूँ
पर बोलता नहीं,

बोला तो
समझेगा नहीं कोई,

सच कोई
सुनना नहीं चाहता,
झूठ बोला नहीं जाता

वो वक़्त भी आयेगा

जब सच सुनना होगा,
झूठ से बचना होगा,

मुझे जानना होगा ,
मुझे पहचानना होगा
डा.राजेंद्र तेला, निरंतर,

08-08-2010

रविवार, 8 अगस्त 2010

अंदाज़

कल क्या होगा 
किसने जाना 
किसी को नहीं पता 
किसे जाना,
किसे रहना 
जो करना है 
वो आज कर ले  
जिंदगी जीने का 
"निरंतर" 
अपना तो है यही 
अंदाज़ पुराना 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

07-08-2010

रेत का गुबार

रेत का गुबार 
उठ रहा है  
कुछ नज़र नहीं रहा है
जिन्दगी में भी
ऐसा ही 
बवंडर उठ रहा है
जो कल तक मेरे साथ था
अनजान बन कर
सामने खड़ा हैं
अचानक ये क्या हो गया ?
अपना पराया कैसे हो गया
रेत का गुबार तो 
ख़त्म हो जायेगा ,
ये बवंडर जिन्दगी को  
पता नहीं कहाँ ले जायेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
07-08-2010

कुर्बानी


मेरे जज़्बातों से 
मत खेलना 
अपनी बर्बादी के 
किस्से मत सुनाना
मेरे सोये हुए 
अफसानों को
मत जगाना
तुम्हारे साथ भी
वही हुआ होगा
जो मेरे साथ हुआ
हर बर्बाद की वही
कहानी
किसी अपने ने ही
ली होगी कुर्बानी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
07-08-2010

हमसफ़र

मेरा हमसफ़र चला गया
सफ़र अधूरा रह गया

अभी भी उसको ढूंढता हूँ
शक्लों से शक्ल उसकी मिलाता हूँ

मिलता जुलता चेहरा ही दिख जाये
शायद इसी से थोडा चैन आ जाये

हर हाल मैं "निरंतर" वो मेरे साथ रहेगा
जिस्म नहीं तो क्या,रूह का तो साथ होगा

07-08-2010