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शनिवार, 7 अगस्त 2010

निराकार को आकार दो

सरकार क्या है
परमात्मा की तरह
निराकार
जो है तो सही
पर दिखती नहीं
हम जितना
परमात्मा से मांगते हैं
उससे ज्यादा
सरकार से मांगते है
सरकार ऐसा कर दे,
सरकार वैसा कर दे
घर बैठे जीवन को
खुशियों से भर दे
अब इस भ्रम जाल से
निकल जाओ
कुछ पाना है तो
आराम,खुदगर्जी
आलस्य को छोड़ दो
येन केन प्रकारेण
धन अर्जन के मोह से
मुक्त हो जाओ
समय बर्बाद मत करो
मष्तिष्क को झकझोरो
मेहनत और
जज्बे से काम करो
अपने से पहले
देश को प्यार करो,
सब कुछ अपने हाथ मैं है
क्यों सरकार से मांगो
मांगना ही है तो,
अपने आप से मांगो
देश के लिए
मर मिटने की शक्ति
जात,पात,भाषा ,प्रान्त,
समाज के प्रपंच से मुक्ति,
बदलना है तो खुद को बदलो
निराकार को आकार दो,
निराकार को आकार दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सरकार,देश,देश भक्ति,जीवन,परमात्मा

06-08-10

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

क्या ऐसा नहीं हो सकता ?

अपनों को छोड़
नए की तलाश में,

अजनबियों की भीड़ में
नया साथ ढूंढते हैं

क्या ऐसा नहीं हो सकता?

अपने तो अपने रहे
पराये,अपने हो जाएँ

अपने और पराये मिल,
एक नया जहाँ बनाएं

जहां कोई किसी में
कुछ नहीं खोजे

रहें एक दूजे में समाये,
नए गीत गाएं,नया सवेरा लायें

क्या ऐसा नहीं हो सकता?

02-08-2010
E

भूख


चक्की के 
पाटों में
पिस कर
गेंहू के दाने
आटा बन ,
पानी में मिला कर
गूंथे जाते हैं
तवे की आंच में
सिक कर
नरम रोटियां बन
इंसान की
भूख मिटाते हैं
पर अब
इंसान की भूख
अपनों  परायों को
पीसने के लिए
सदा तैयार
प्यास के लिए खून
पैसे के लिए जान
लेना रह गया है
एकमात्र हथियार
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
01-08-2010
इंसान,भूख,जीवन,जान लेना, घ्रणा,द्वेष

E

जीवन-म्रत्यु


उजाला गया
अँधेरा आया
अँधेरा गया
उजाला आया
पैदा होना
फिर मर जाना
उजाले का आना
जाना ही तो है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,म्रत्यु

01-08-2010
E

नयी तस्वीर बनाना चाहता हूँ,

ज़िंदगी की
कैनवास पर
संवेदनाओं के
चटकीले रंगों से
नयी तस्वीर
बनाना चाहता हूँ,
सड़ी गली यादों से
मुक्त होना चाहता हूँ
दर्द के पलों को भूल कर
नए सिरे से
जीना चाहता हूँ
इंसान हूँ
इंसान बन कर
रहना चाहता हूँ© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,ज़िंदगी,संवेदना,selected
03-08-2010

मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो ..........



मेरे जज्बातों से
मत खेलो
बीती बातों को जाने दो
बर्बादी के किस्से को
भूल जाने दो
अकेला हूँ
अहसास न दो
कौन था
उसका नाम मत पूछो
सोते हुए अरमानो को
सोता ही रहने दो
टूटे हूए ख्वाबों को
टूटा ही रहने दो
मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत ,शायरी 
E
03-08-2010

सबका अंदाज़ निराला है

जीने का सब का
अंदाज़ निराला है
किसी के हाथ में हाला
किसी के हाथ में
बामुश्किल निवाला है
किसी को चाहिए मलाई मिठाई
किसी को साथ में प्याला 
सोचता हूँ क्यूं होता हूँ
परेशान निरंतर
कोई कैसे जीता है?
किसी की बात करूँ भी क्यों?
सब का अपना पैमाना है
जिसको जैसे जीना है
उसको वैसे ही जीने दो
अपने मन की करने दो
जीने का सब का
अंदाज़ निराला है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
हाला =शराब
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
03-08-2010
जीवन,निराला,ज़िंदगी

E

जीवन का है यही चलन


नन्हे बीज को 
मिटटी में रोप दिया

पानी से सींच कर,

छाया में छोड़ दिया
मन में थी उमंग बहुत,
और थी थोड़ी आकुलता
कैसी होगी आभा उसकी,
कैसा होगा रूप?
नित्य उसको सींचता,
कब प्रस्फुटित होगा
जिज्ञासा से देखता
फिर वो दिन आया,
चीर के माटी बीज
प्रस्फुटित हो गया
मीठी मुस्कान लिए
नन्हे से दो पत्ते
मुख दिखाने लगे 
दिन आते गए 
दिन जाते गए
नन्हा बीज पौधा बना,
सोते से जैसे जग पड़ा
ऊंचाई चौड़ाई दोनों बढ़ी,
नयी टहनिया भी निकली
मेरी भी जिज्ञासा घटी,
थोड़ी सी निश्चिंतत़ा बढ़ी
समय के अन्तराल मैं
खूब फलेगा,खूब फूलेगा
सोच कर संतुष्ट हुआ
फिर एक दिन ऐसा आया,
पौधा अचानक कुम्हलाया
देखते देखते, निर्जीव 
हो गया
सम्पूर्ण होने से 
पहले ही अपूर्ण रह गया
जीने से पहले ही मृत्यु ?
विधि का विधान ही ऐसा है
चाहते हैं वह होता नहीं
जो होता है,वो चाहते नहीं
किसको जाना,किसको रहना
किसी को पता नहीं
काल से अकाल तक
चलती रहेगी यह प्रक्रिया
कौन आयेगा?,कौन जायेगा?
प्रश्न ही रह जायेगा
ना किसी को पता था पहले,
ना आगे हो पायेगा
जो आया है वो जायेगा,
कब जायेगा पता नहीं
जीवन का है यही चलन
जीवन का है यही चलन
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
04-08-2010
जीवन,मृत्यु,selected

जीवन यात्रा


यात्रा के लिए टिकट लेकर,
रेल के डिब्बे मैं बैठ गया
धीरे धीरे डिब्बा भरा,
गाड़ी चलने का
इंतज़ार होने लगा
सीटी बजी गाडी चली,
यात्रा शुरू हो गयी
यात्रियों ने राहत की सांस ली
डिब्बे की निस्तब्धता
भंग होने लगी ,
खुसुर पुसुर बढ़ने लगी
जाने अनजाने लोगों मैं,
बात चीत होनी लगी
ऐसा लग रहा था,
जैसे गावं की चौपाल पर ,
विचार विमर्श हो रहा था
दूसरे के बारे में
जानने.की इच्छा रख
हर शख्श बतिया रहा था 
कोई खांस रहा था,
कोई रात की थकान को
उबासी लेकर उतार रहा था
किसी के चेहरे पर पीछे छूटे
परिवार का विषाद था
किसी के मुख पर,परिवार से
मिलने का उल्लास था
किसी को होने वाले
इम्तहान का तनाव 
कोई नए शहर में ,
बसने के ख्याल से परेशान
कोई अपने सामान की
रक्षा मैं व्यस्त
कोई प्रेमिका से 
मिलने को व्याकुल,
कोई माँ बाप से
मिलने को आतुर
कुछ मुस्करा रहे थे,
छुटियाँ कैसे बितायंगे
उस पर बतिया रहे थे
कोई परिवार में हुई
गमी से त्रस्त था,
तो कोई नयी बहु के 
आगमन की चर्चा में 
व्यस्त था
मैं बठे बैठे सोच रहा था
सबके अपने अपने प्रश्न
सबके अपने उत्तर हैं
हर किसी को किसी ना 
किसी बात की चिंता है
कल क्या होगा ?
जानने की इच्छा है
रेल के सफ़र और जिन्दगी के
सफ़र में कोई फर्क नहीं होता,
दोनों जगह वो ही सवाल
वो ही जवाब
फर्क सिर्फ इतना सा है
रेल में टिकिट लेकर बैठना 
पड़ता है,
जीवन मैं बगैर टिकिट बैठने की
मजबूरी होती है
वहां ज्यादा पैसे खर्च कर,
ऊंची क्लास मैं बैठ सकतें हैं,
जीवन में
क्लास की चाहत नहीं चलती
अपना अपना भाग्य है
कौन किस डिब्बे मैं सफ़र करे
सिर्फ ऊपर वाला तय करता है
किसका सफ़र कब ख़त्म होगा.
क्यों नहीं जीवन यात्रा को
हँसते हँसते पार करूँ,
सहयात्री को दुश्मन ना समझूं 
मधुर व्यवहार करूँ
दूसरों के सफ़र में मददगार बनूँ
जितना अपनो को उतना ही
दूजों को भी प्यार करूँ,
इसी सोच में वक़्त गुजर गया
मैं भी गंतव्य पर पहुँच गया
सामान समेट 
डिब्बे से उतर गया
मेरी यात्रा तो ख़त्म हुई
बाक़ी की का क्या होगा ?
यही सोचते सोचते ,
घर पहुँचते ही सो गया
05-08-2010
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन यात्रा,जीवन,रेल ,रेल यात्रा 
E

मेरे असीमित संसार को सीमित ना बनाओ


मेरे असीमित संसार को,
सीमित ना बनाओ
घिसी पिटी बातों से,
अब मुझे ना बर्गालाओ
संस्कार की बात को ही,
आगे ना बढाओ
अपनों को चाहता हूँ,
मेरी इस कमजोरी को,
हथियार ना बनाओ
बढे बूढों ने सिखाया था,
सच बोलो,
बड़ों का अभिनन्दन करो,
घर आये का सम्मान,
परिवार का गुणगान
उसके विपरीत मैंने देखा,
झूंठ को सच बनाना,
पीठ पीछे 
रिश्तेदारों की बुराई,
जरूरत पड़ने पर 
उनको ही सबसे नज़दीक 
बताया जाता था
पडोसी जो 
परिवार की ख़ुशी से
दुखी होते थे,
घर आने पर,सबसे 
अच्छे पडोसी कहे जाते थे,
जोड़ तोड़ कर खर्चा 
चलाया जाता था
फिर भी पैसे को बाएं हाथ का,
मैल बताया जाता था,
मित्रों को क्या कहना है
घर पर सिखाया जाता था
बाहर बच्चों को सबसे अच्छा
बताया जाता था
घर आकर उन्हें ही 
निकम्मा कहा जाता था,
छोटे का दबी जबान में 
प्रतिरोध भी
बदतमीजी कहलाता था
हम ही सबसे अच्छे है
गर्व से 
सबको बताया जाता था
खूबसूरती से,
सच को छुपाया जाता था
क्या पढना है?,क्या बनना है?
ठोकपीट कर बताया जाता था
विधि की विडम्बना ही थी,
मेरे अपनों को उनके बड़ों ने,
यही सिखाया था
ऐसा नहीं कि बड़े जानते नहीं थे,
सच को पहचानते नहीं थे
उनकी भी मजबूरी थी
उनके दिल-ओ-दिमाग में
यही बसाया गया था
असीमित संसार मैं,
उन्हें भी सीमित बनाया गया था
व्यथित हो गया हूँ 
इन असीमित असत्यों से
सुनहरी कहानियों के 
प्रलोभनों से,
सीमित होना मरने के बाद भी,
मेरी आत्मा को कचोटेगा
तो क्यों नहीं,इसी जीवन मैं,
सीमित होने का ठप्पा उतारूं,
बरसों से ढोए जा रहे कथित
संस्कारों का बोझ उतारूँ,
साफ़ सुथरी जिन्दगी 
जीना चाहता हूँ,
अपनों को अपना 
बनाना चाहता हूँ
जो बनते हैं 
पर होते नहीं अपने
उन अपनों से दूर रहना 
चाहता हूँ
जो भी हूँ,जैसा भी हूँ 
वैसा ही दिखाई दूं
सत्य को सत्य,
असत्य को असत्य कह सकूं
मैंने भी सोच लिया है, 
फैसला कर लिया है,
संस्कार और परम्परा के 
नाम पर,
सीमा मैं बंधना छोड़ दिया है
मुझे पता है 
इसका प्रतिरोध होगा,
अपनों से ही मेरा विरोध होगा
चिंता नहीं है मुझ को,
कौन नाराज होगा?
कौन अपना सर धुनेगा?
अब मैंने भी असमीत होना

सीख लिया है
04-08-2010
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
संस्कार,जीवन,परम्परा ,सीमित असीमित
E